सवाल वही, किरदार बदल गए

हम अक्सर कहते हैं कि सत्ता और व्यवस्था से सवाल होने चाहिए—काम समय पर क्यों नहीं हुआ? जिम्मेदार व्यक्ति पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? कानून की कमियों का फायदा उठाकर हर बार कोई न कोई कैसे बच जाता है?

सवाल बहुत होते हैं, आवाज़ें भी उठती हैं, लेकिन फिर भी कुछ बदलता हुआ दिखाई नहीं देता। आखिर क्यों?

इसे एक कहानी से समझते हैं।

एक छात्र सवाल पूछना शुरू करता है। उसके सवाल सच्चे हैं और इरादे साफ़ हैं। उसे लगता है कि यदि ज्यादा लोग आवाज़ उठाएँगे, तो व्यवस्था बेहतर होगी और काम सही तरीके से होने लगेंगे।

बदलाव लाने की चाह में वह छात्र राजनीति से जुड़ता है। फिर धीरे-धीरे किसी राजनीतिक दल की युवा इकाई तक पहुँच जाता है।

सवाल वह अब भी करता है, लेकिन अब हर मुद्दे पर नहीं। उसकी आवाज़ में अपने दल का पक्ष और विरोधी दल के लिए सवाल ज्यादा दिखाई देने लगते हैं।

दस साल बाद वह मुख्यधारा की राजनीति में आता है, चुनाव लड़ता है और जीत जाता है।

अब उसके पास केवल सवाल नहीं, कुछ बदलने की ताकत भी है। लोगों को उम्मीद होती है कि हालात सुधरेंगे। शुरुआत में कहा जाता है—बदलाव में समय लगता है। लेकिन समय गुजरता रहता है और व्यवस्था लगभग वैसे ही चलती रहती है जैसे पहले चल रही थी।

क्योंकि सत्ता के साथ अक्सर इंसान की प्राथमिकताएँ भी बदल जाती हैं।

जो कभी जनहित की बात करता था, वह अब अपनी सुविधाओं के बारे में सोचने लगता है। समाज की जगह परिवार और करीबियों के हित महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सवालों की जगह समझौते ले लेते हैं और बदलाव की जगह व्यवस्था में अपनी जगह सुरक्षित करना ज्यादा जरूरी लगने लगता है।

हम दूसरों से जवाब माँगने में बहुत आगे रहते हैं, लेकिन जब जवाब देने की बारी खुद की आती है, तो हम भी उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं जिसे कभी बदलने निकले थे।

और फिर यही सिलसिला आगे बढ़ता रहता है।

व्यवस्था वही रहती है, सवाल वही रहते हैं—बस सवाल पूछने वाले किरदार बदल जाते हैं।

सोचने वाली बात है।

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