लोकतंत्र में हर किसी का अपना एक किरदार है।
राजनीतिक दलों का काम है अपनी नीतियां बनाना, अपने फैसलों को जनता के सामने रखना और जरूरत पड़ने पर उनका बचाव करना। इसके लिए उनके पास नेता हैं, प्रवक्ता हैं और पूरी संगठनात्मक व्यवस्था है।
सरकार का काम है शासन करना और जनता के सवालों का जवाब देना।
और जनता का?
जनता का काम सवाल पूछना है।
लेकिन अक्सर होता इसका उल्टा है।
कोई सरकार से सवाल पूछता है और जवाब सरकार से पहले उसके समर्थक देने लगते हैं। कोई किसी फैसले पर सवाल उठा दे, तो हम उसे ऐसे लेते हैं जैसे सवाल सरकार से नहीं, हमसे व्यक्तिगत रूप से पूछा गया हो।
फिर हम खुद उस पार्टी के प्रवक्ता बन जाते हैं जिसे हमने वोट दिया था।
जबकि हमें यह समझना चाहिए कि वोट देकर हमने किसी राजनीतिक दल की नौकरी नहीं ली है।
जिसे वोट दिया है, उसके अच्छे काम की तारीफ जरूर कीजिए। लेकिन जहां सवाल बनता है, वहां सवाल भी कीजिए।
क्योंकि सत्ता में कोई भी हो, जनता का किरदार सत्ता का बचाव करना नहीं, उसे जवाबदेह बनाए रखना है।
राजनीतिक दलों का पक्ष रखने के लिए उनके पास अपने लोग हैं।
लेकिन जनता की तरफ से सवाल पूछने के लिए?
वह किरदार हमें ही निभाना है।
अगर जनता भी सवाल पूछना छोड़कर राजनीतिक दलों का बचाव करने लगे, तो फिर सत्ता से सवाल पूछेगा कौन?
सोचने वाली बात है।