मुंबई, 24 सितंबर 2026: भारत में हर साल त्योहारों की शुरुआत एक ही तरह से होती है: जब कोई गाना बजाता है। चाहे केरल में अभी भी गूंज रहे ओणम के गीत हों, महाराष्ट्र में गणेश पूजन के भजन हों, गुजरात में डांडिया के गाने हों, या कोलकाता में दुर्गा पूजा के ढोल-नगाड़ों की आवाज़। नवंबर आते-आते पूरा परिवार एक साथ बैठकर दिवाली की पार्टी के लिए पसंदीदा गानों की लिस्ट बनाने लगता है। और दिसंबर आते ही घर में क्रिसमस के संगीत की गूंज सुनाई देने लगती है। त्योहार बदल जाते हैं, भाषाएं बदल जाती हैं, लेकिन संगीत हर पल हमारे साथ रहता है।
यह म्यूजिक अपने साथ एक बहुत ही खास अहसास लाता है। भारत में हर हफ़्ते स्पॉटिफ़ाई इस्तेमाल करने वाले 100 में से 59 लोग कहते हैं कि यह ऐप उन्हें सिर्फ़ ख़ुशी और मज़ा देता है, और इसके कोई निगेटिव अनुभव नहीं हैं। 73% लोगों को लगता है कि सोशल मीडिया पर टाइम बिताने के मुक़ाबले स्पॉटिफ़ाई सुनना ज़्यादा अच्छा अनुभव है। वहीं, 76% लोग मानते हैं कि इस ऐप का उनकी ज़िंदगी पर बढ़िया असर पड़ता है। अगर आपने कभी कोई प्लेलिस्ट चलाई है और पहला गाना ख़त्म होने से पहले ही आपका मूड फ्रेश हो गया है, तो आप इस अहसास को अच्छी तरह समझते हैं। अब सोचिए, यही अहसास अगर पूरे त्योहारों के सीज़न में बना रहे! स्पॉटिफ़ाई का नया डेटा दिखाता है कि यह ख़ुशी कई हफ़्तों तक लगातार बनी रहती है, जो कि सच में बहुत ख़ूबसूरत बात है।
आपके पूरे दिन का साथी: म्यूजिक
भारत में लोग स्पॉटिफाई पर हर दिन औसतन दो घंटे बिताते हैं। अगर आप ध्यान दें कि ये घंटे कहाँ बीतते हैं, तो बात बिल्कुल समझ आती है: शहर के जागने से पहले सुबह की सैर, बच्चों के साथ कार में गाने बदलने की खींचतान, काम के वक्त एकाग्रता के लिए लूप पर चलते लो-फाई बीट्स, घर के काम निपटाते हुए क्राइम पॉडकास्ट सुनना, या लंबे दिन के बाद अपनी पसंदीदा प्लेलिस्ट के साथ सुकून पाना। यह दिन के वे पल हैं जहाँ स्क्रीन काम नहीं आती, लेकिन संगीत हर कदम पर साथ रहता है। सर्वे में शामिल 86% श्रोताओं का कहना है कि वे ध्यान से संगीत या पॉडकास्ट सुनने के लिए वीडियो का साउंड म्यूट कर देते हैं।
मौसम बदलने के साथ ही सुनने का अंदाज़ भी बदल जाता है
जैसे-जैसे त्योहार का मौसम करीब आता है, पूरे देश का मिज़ाज बदलता हुआ सुनाई देता है। पार्टी प्लेलिस्ट की स्ट्रीमिंग 34% बढ़ जाती है। भक्ति संगीत की सुनने की दर में 13% की बढ़ोतरी होती है। सुबह दीया जलाते वक्त बजती धीमी आरती, और शाम होते ही शुरू होती पार्टी प्लेलिस्ट: दोनों एक ही घर में, एक ही इंसान द्वारा, एक ही दिन में सुने जाते हैं। भारत के त्योहारों की यही खूबसूरती है: भक्ति और जश्न अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ चलते हैं।
फिर हेडफोन उतर जाते हैं। म्यूजिक व्यक्तिगत न रहकर शेयर्ड स्पेसेस, टीवी, कार और स्पीकर्स में गूंजने लगता है। अगस्त के मुकाबले इसमें 11% की बढ़त देखी गई है, जो बढ़कर हर हफ्ते 52.4 लाख घंटों तक पहुँच जाती है। लिविंग रूम म्यूजिक से भर जाता है, रसोई घर में भी म्यूजिक सुनाई देता है, और परिवार से भरी कार में भी धुनें गूंजती हैं। जो म्यूजिक पहले सिर्फ एक इंसान का था, वह सबका बन जाता है। यही बदलाव है। यही यह मौसम है।
संगीत हर लम्हे को खास बना देता है
एक वजह है कि त्यौहारों का मौसम संगीत की बदौलत ही सच में त्यौहार जैसा लगता है। यह वही चीज़ है जो खाना पकाने को एक जश्न में बदल देती है। वही चीज़ जो कज़िन्स के साथ दो घंटे के कार के सफर को पूरे दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा बना देती है। वही चीज़ जो एक आम मंगलवार की शाम को भी एक यादगार पल बना देती है, सिर्फ इसलिए क्योंकि किसी ने सही वक्त पर सही गाना बजा दिया।
परिवार, अपनों की गर्माहट और प्यार जताने वाले इस त्यौहारों के मौसम में, यह एहसास बहुत मायने रखता है। त्यौहारों के इस मौसम में स्पॉटिफाई सिर्फ वो जगह नहीं है जहाँ भारत सुनता है। यह वो जगह है जहाँ भारत खुलकर अपनी असली खुशी महसूस करता है।