जयपुर। राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के निष्क्रिय और विकास नहीं कराने वाले विधायकों के टिकट कट सकते हैं।
पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी में टिकट के लिए ‘सिटिंग गेटिंग’ का फॉर्मूला बदलने जा रहे हैं। इसके स्थान पर अब उम्मीदवार चयन के लिए पिछले पांच साल में जनता के बीच नाराजगी या लोकप्रियता का पैमाना देखेंगे, वहीं उसके विकास कार्यो की रिपोर्ट भी टिकट का आधार बनेगी।
पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी उपाध्यक्ष बनने के बाद पिछले कई दिन से पार्टी के राष्ट्रीय महासचिवों और सचिवों के साथ संगठन को मजबूत बनाने और आगामी विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को सुधारने के लिए विचार-विमर्श कर रहे हैं।
उन्होंने पिछले दो माह में दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. चन्द्रभान को दिल्ली बुलाकर राज्य विधानसभा चुनाव को लेकर बातचीत की।
उन्होंने प्रदेश प्रभारी महासचिव मुकुल वासनिक से भी प्रदेश के हालात सुधारने, जनता से सम्पर्क नहीं रखने वाले विधायकों की सूची बनाने को कहा था। इसी बातचीत में नेताओं ने उन्हें उम्मीदवार चयन को लेकर कई चौंकाने वाले सुझाव दिए हैं। इन्हें राहुल गांधी गंभीर मान रहे हैं, क्योंकि वे निचले स्तर तक के कार्यकर्ता को पार्टी की मुख्यधारा में लाकर यह संदेश देने वाले है कि अब पैराशूटी और सिफारिशी नेताओं का दौर खत्म हो गया है। नए और समर्पित पार्टी कार्यकर्ताओं को चुनाव लड़ाना जरूरी है।
कांग्रेस के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी के मुताबिक टिकट चयन में एक फॉर्मूला युवा और महिला आरक्षण का भी है। पार्टी के नेता महिला आरक्षण बिल पास नहीं होने पर टिकट में ही यह आरक्षण देना तय कर रहे हैं।
विधानसभा चुनाव में दस हजार से ज्यादा और लोकसभा में 20 हजार से ज्यादा मतों से हारने वाले उम्मीदवार को फिर से टिकट नहीं देने का भी नेताओं ने सुझाव दिया है। इसके साथ ही लगातार या दो बार हारे हुए जमानत जब्त करा चुके नेता को भी टिकट नहीं देने पर विचार किया जा रहा है। वर्तमान विधायकों को टिकट देते समय उनकी क्षेत्र में वास्तविक स्थिति का पूरी तरह सर्वे कराया जाएगा और इसकी रिपोर्ट को टिकट वितरण में प्रमुखता मिलेगी।
अब तक पार्टी यह तय कर देती थी कि सभी वर्तमान विधायकों को टिकट दे दिया जाए, इसका नुकसान पार्टी वर्ष 2003 और 2008 के चुनाव में उठा चुकी है। 2003 में तो कांग्रेस के 156 में से 56 विधायक ही जीत कर आ पाए थे और उनके भी मात्र 26 नेता ऐसे थे जो पहले विधायक थे। इसी तरह वर्ष 2008 में भी पार्टी बड़ी मुश्किल से 96 विधायक जीता पाई थी। बाद में बसपा के छह विधायकों के पार्टी में शामिल होने पर यह संख्या 102 पहुंच पाई थी। इन सब अनुभवों को पार्टी नेताओं ने राहुल गांधी के समक्ष रखा है।
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