नई दिल्ली। मेरठ से आए क्रांतिकारी सैनिकों की दिल्ली में मौजूदगी के बाद पूरी दिल्ली में स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति की लहर दौड़ गई। अंग्रेज नागरिक और सैनिक सिर छुपाने के लिए जगह तलाश करने लगे। शाही सैनिक चुन-चुन कर बदला लेने पर आमादा थे। इस लड़ाई का प्रमुख गवाह कश्मीरी गेट भी बना। 1857 में अंग्रेजी और शाही फौजों के बीच सबसे भयानक लड़ाई कश्मीरी गेट और उसके आस-पास के इलाकों में हुई थी।
एक फकीर ने छुड़ाए थें अंग्रेजों के छक्के
कश्मीरी गेट की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान मौजूद हैं। तब इस गेट के समीप घनी आबादी थी और हजारों लोगों ने इस लड़ाई में अपनी जान की बाजी लगाई थी। यहां मारे गए अंग्रेज सैनिकों को पास के सेंट जेम्स चर्च में दफनाया गया था। इस ऐतिहासिक चर्च का निर्माण कर्नल स्किनर नाम के फौजी अफसर ने कराया था। उस समय इस चर्च को बनवाने पर 80 हजार रुपये का खर्च आया था। बाद में कर्नल स्किनर को भी इसी चर्च में दफनाया गया।
दीवारों से घिरी मुगल सम्राट की राजधानी दिल्ली में कुल 14 गेट थे। इनसे होकर लोग दिल्ली शहर में दाखिल होते थे।
सौ गांवों को जलाया, 1085 लोगों को फांसी पर चढ़ाया
कश्मीरी गेट शाहजहांनाबाद शहर (जिसे अब पुरानी दिल्ली कहा जाता है) के उत्तर में स्थित है। इस गेट का निर्माण सैन्य इंजीनियर रॉबर्ट स्मिथ ने 1835 में कराया था। बताया जाता है कि इसका नाम कश्मीरी गेट इसलिए पड़ा क्योंकि यह उस रास्ते का गलियारा था जो कश्मीर को जाता था। यमुना से मात्र कुछ दूर पर स्थिति कश्मीरी गेट के करीब अंग्रेजों ने रहने के लिए इमारतें बनवाई थीं। कुछ इमारतें आज भी देखी जा सकती हैं। कलकत्ता गेट से क्रांतिकारी फौजियों से बचकर भाग रहे अंग्रेज अफसरों ने जब कश्मीरी गेट पर तैनात सैनिकों को क्रांतिकारी सैनिकों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया तो इन सैनिकों ने आदेश मानने से इन्कार कर दिया। उन्होंने अंग्रेज अफसरों पर ही बंदूकें तान दीं। यहां अंग्रेज बुरी तरफ विफल रहे और जान बचाकर दिल्ली से भागने के लिए रास्ता तलाशने लगे। इतिहासकार अमरेश मिश्र का कहना है कि कश्मीरी गेट की लड़ाई ऐतिहासिक थी क्योंकि दिल्ली पर कब्जा करने के लिए 14 सितंबर को कश्मीरी गेट पर अंग्रेजों ने लगभग 15 हजार सैनिकों के साथ धावा बोला। इन 15 हजार सैनिकों में 12 हजार सैनिक अंग्रेज थे। शेष किराए के सैनिक थे। यह पहली फौज थी जिसमें ब्रिटिश सैनिक मंगाए गए थे। लेकिन इनको जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा।
दस्ते ने काबुल गेट से भी घुसने की कोशिश की। विरोध इतना प्रबल था कि अंग्रेज 21 सितंबर को लाल किला पहुंच सके। कश्मीरी गेट से लाल किले की दूरी अंग्रेजों से सात दिन में तय की। इतिहासकार एरिक स्ट्रोक्स ने लिखा है कि अंग्रेजों के 15 हजार सैनिकों में से मात्र 2 हजार सैनिक बचे थे। 13 हजार सैनिक लड़ाई में मारे गए थे।