तुलसी सेवा संसथान और संजीवनी क्लब द्वारा संत पुष्करदास जी का अभिनंदन

गाय की पूँछ छूने मात्र से मुक्ति का मार्ग खुल जाता है:श्री पुष्करदास जी महाराज
भक्ति तथा प्राणिमात्र के साथ विशुद्ध प्रेम करने से सबको मुक्ति: संत पथ जी महाराज
अपने भक्तों की कथा से प्रसन्न होते हैं:स्वामी शिवज्योतिषानन्द
श्री पुष्कर गौ आदि पशुशाला द्वारा लोहागल रोड स्थित गौशाला में नरसी मेहता और नानी बाई का मायरा कथा
सत्संग भी प्रसाद का एक स्वरुप
प्रभु नाम का स्मरण करने से सभी प्रकार की अग्नियों से मुक्ति
ज्ञान में तर्क-वितर्क होता है, भक्ति में समर्पण

6अजमेर। श्री पुष्कर गौ आदि पशुशाला समिती की ओर से लोहागल रोड स्थित गौशाला में चल रही भक्त नरसी मेहता और नानी बाई का मायरा कथा के चतुर्थ दिवस बुधवार को सुविख्यात संत एवं कथावाचक श्री पुष्करदास जी महाराज ने कथा के दौरान कहा कि गाय की पूजा से समस्त देवताओं की पूजा का पुण्य फल प्राप्त होता है। गाय में सभी देवता निवास करते हैं। गौ माता की महिमा अपरंपार है। मनुष्य अगर जीवन में गौ माता को स्थान देने का संकल्प कर ले तो वह संकट से बच सकता है। मनुष्य को चाहिए कि वह गाय को मंदिरों और घरों में स्थान दे, क्योंकि गौमाता मोक्ष दिलाती है। पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है कि गाय की पूँछ छूने मात्र से मुक्ति का मार्ग खुल जाता है। जिस घर में गाय को निवास कराया जाता है। उस घर में 33 कोटि देवता प्रसन्न रहते हैं। वहां किसी भी प्रकार का वास्तुदोष बगैर किसी उपाय को करें स्वतः ही दूर हो जाता है।
कथा में विशेष रूप से आशीर्वाद देने पधारे चित्रकूट धाम पुष्कर के अधिष्ठाता सदगुरु संत श्री पाठक जी महाराज ने कहा कि भक्त नरसी मेहता ठाकुर जी में डूब गए थे। इस पृथ्वी में जिन्होंने भारत खण्ड में जन्म लेकर गोविन्द के गुणों का गान किया, उनके माता-पिता को धन्य है और उन्होंने अपना जीवन सफल कर लिया। सदा भगवत्प्रेम में निमग्न रहने वाले भक्त नरसी मेहता अपने भक्ति पदों के द्वारा भगवान को सदा रिझाते रहे। उनके पद भक्तों के लिये कण्ठहार रूप में प्रसिद्ध ही हैं। उन्होंने नरसी मेहता के जीवन से संबंधित अनेक रोचक प्रसंग सुनाये और बताया कि वे एकदम विरक्त-से हो गये और लोगों को भगवद्भक्ति का उपदेश देने लगे। वे कहा करते थे भक्ति तथा प्राणिमात्र के साथ विशुद्ध प्रेम करने से सबको मुक्ति मिल सकती है।
कथा में विशेष रूप से आशीर्वाद देने पधारे संन्यास आश्रम के अधिष्ठाता स्वामी शिवज्योतिषानन्द जी महाराज ने कहा कि भगवान खुद की कथा से इतने प्रसन्न नहीं होते जितने अपने भक्तों की कथा से प्रसन्न होते हैं। भगवान को भक्त तो प्यारा है ही, उन भक्तों का भी जो भक्त होता है अथवा उनके चरित्र की कथा सुनता है, भगवान उन्हें सबसे ज्यादा प्यार करता है। गौ माता के सानिध्य में जो कथा सुनी जाती है वह सहस्रगुणा अधिक फलदायी होती है। परमात्मा सदैव धर्म की रक्षा के लिए पृथ्वी पर अवतार लेते हैं। भगवन कहते हैं कि उनमे इतना सामर्थ्य नहीं कि गायों को पल सकूँ, गायें मेरा पालन करती हैं, इसलिए मेरा नाम गोपाल हैं। गायें भगवान की स्वामिनी होती हैं, इसलिए भगवान उनके पदचिन्हों पर चलते हैं। उन्होंने कहा कि मंदिरों में चंवर डुलाया जाता है जो गाय की पूँछ का प्रतीक है। भगवान विष्णु ने गाय की पूँछ में विश्राम किया था जबकि लक्ष्मी ने गाय के गोबर में विश्राम किया। माना जाता है कि गौमूत्र में गंगा का और गोबर में लक्ष्मी का निवास होता है।
कथा आयोजन समिति के लक्ष्मी नारायण हटूका ने बताया कि संत श्री पुष्करदास जी महाराज ने कहा कि जैसे किसी गाड़ी का फिलटर उसमे आने वाले प्रदूषणकारी तत्वों को रोकता है उसी प्रकार भजन और सत्संग मनुष्य के भीतर आने वाले बुरे विचारों को रोक कर सकारात्मक विचारो को प्रवाहित करता है। प्रसाद का भी मनुष्य के जीवन में बहुत महत्व है इसलिए मनुष्य को कभी भी प्रसाद का अनादर नहीं करना चाहिए। सत्संग भी प्रसाद का एक स्वरुप है। सत्संग कानों के भीतर जाकर शरीर को सात्विकता प्रदान करता है, इसलिए सत्संग को प्रसाद मन जाता है। प्रसाद का एक अर्थ प्रसन्नता भी है।
संत श्री पुष्करदास जी महाराज ने कहा कि दरिद्रता, दुख, आग और दोष पूजा-पाठ करने से नहीं बल्कि सत्संग करने और प्रभु प्रसाद को आस्था से ग्रहण करने से मिट्टी हैं। नरसी मेहता की कथा में नरसी जी सदैव इसलिए प्रसन्न रहते है, क्योंकि वे प्रभु भक्ति में लीन रहते हैं, जबकि उन भाई और भाभी इसलिए दुखी रहते हैं क्योंकि वे प्रभु नाम से विलग हैं। प्रभु नाम का स्मरण करने से सभी प्रकार की अग्नियों से मुक्ति मिलती है। कथा मे आत्मा से परमात्मा का मिलन होता है।
संत श्री पुष्करदास जी महाराज ने कहा कि ज्ञान में अभिमान होता है, भक्ति में विनम्रता होती है। ज्ञान में कर्म फल और मोक्ष प्राप्ति की इच्छा होती है, भक्ति में सिर्फ सेवा की। ज्ञान में तर्क-वितर्क होता है, भक्ति में समर्पण। ज्ञान में विद्वता और क्षमता का प्रदर्शन होता है, भक्ति में सहिष्णुता का। इसलिए भक्त को ईश्वर प्राप्ति का परम साधन माना गया है। भक्ति समर्पण है और जहां समर्पण होता है वहां तर्क-वितर्क नहीं होता। समर्पण में प्रश्न नहीं पूछा जाता। भक्ति निश्छलता को कहते हैं। अगर आप भगवान् को मानते है तो भगवान् पर भरोसा रखे और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान् कि पूजा करे पूजा करने या भगवान् की भक्ति के लिए जरुरी नही है कि आप पूरा दिन मंदिर मैं पूरा दिन बैठे मंदिर जाये पूजा करे या भगवान् के लिए अपने शरीर को कष्ट दे जैसे कि वर्त रखना और बुखे रहना! सभी को पता है कि सुबह उठकर पूजा कि जाती है गंगाजल से घर और पूजा क स्थान को शुद्ध किया जाता है भगवान् ये सब करने के लिए नही कहता है।
संत श्री पुष्करदास जी महाराज ने कहा कि ईश्वर का असली स्थान हमारे मन मैं है। जरुरी नही है कि जगह-जगह पर जाकर आपको भगवान् मिले वो तो आपके मन मैं है जब चाहो याद करना भर ही काफी है सच्चे मन से याद करो तो मन को शांति मिलती है। भगवान् को याद करने का दूसरा तरीका यह भी है कि आप किसी शांत जगह पर जाकर भगवान् का ध्यान करें।
संजीवनी क्लब की महिलाओं ने संत श्री पुष्करदास जी महाराज का अभिनंदन किया। क्लब की सदस्य कांता शाह, कमलेश मंगल, ऊषा शर्मा, अंजना पंसारी और रामचंद पंसारी ने अभिनंदन किया। तुलसी सेवा संसथान के ओम प्रकाश मंगल, किशन चाँद बंसल, शंकर लाल बंसल, भोलेश्वर भट्ट, तीरथ राम शर्मा, हरिशंकर सारण, उमेश गर्ग, बद्री जी मैदा वाले, शिवशंकर फतेहपुरिया, विष्णु प्रकाश गर्ग और सत्यनारायण पालड़ीवाल ने संत जी का अभिनंदन किया। विद्वान आचार्यगण पंडित गोविन्द जी कोइराला, आचार्य बालकिशन और आनंद जी ने भगवत पूजन कराया।
कथा के दौरान संत श्री पुष्करदास जी महाराज ने साज की मधुर धुन पर गोविन्द नाम संकीर्तन के पश्चात तुम ओ पालनहारे, निर्गुण और न्यारे, हरि भजन बिना सुख शांति नहीं, सामने सबके प्रभुजी विराजे पर कोई देख सकता नहीं है, नरसी मेहता के गुजराती पद भूतल भक्ति पदार्थ मोकु अमरलोक मा नाही रे और मने एक तमारो आधार रे सांवरा गिरधारी, दुनिया का सहारा क्या लेना तेरा एक सहारा काफी है, आप जिनके करीब होते हैं, वो बड़े खुशनसीब होते हैं, मेरे तो आधार श्री राधा के चरणारविन्द, आदि भजन भी प्रस्तुत किये जिस पर कथा प्रांगण मे उपस्थित श्रद्धालु भाव विभोर होकर नृत्य करने लगे। मंच संचालन उमेश गर्ग ने किया।

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