
मंडल प्रवक्ता राम चन्द टहलानी के अनुसार संत ओंकार ने कहा कि ज्ञान कर्म में ढ़ले तो जीवन का श्रृंगार बने,वेशभूषा तो रावण की भी संतो जैसी थी पर उसके कर्म अच्छे नहीं थे।इंसान कर्म से ही महान बनता है परमात्मा तीन प्रकार के इंसानो को कभी माफ़ नहीं करते हैं एक पैसा होते हुए भी इंसान कंजूसी करें,दूसरा इंसाफ की कुर्सी पर बैठकर अन्याय करे,तीसरा संतों की वेशभूषा चोला पहनकर गलत कार्य करे।सदगुरु ने हमें चुना है फिर ज्ञान देकर सत्कर्म करने के लिए प्रेरित किया है इसलिए हम परमात्मा की निस्वार्थ,निरोल भक्ति करें।चौरासी लाख योनियां भुगतने के बाद परमात्मा ने इस जीव पर तरस खाकर मानव योनि बक्षी है ताकि हम परमात्मा का गुणगान कर सकें,गुरु की महिमा गा सकें।गुरु की,सतगुरु की महिमा अपरंपार है गुरु से जुड़ने पर हमारा दूसरा जन्म होता है तो फिर खाना पीना और सो जाना हमारे जीवन का आधार नहीं होना चाहिए गृहस्थ का हर कार्य करते हुए हम परमपिता परमात्मा की भक्ति करें।
प्यार,नम्रता,सहनशीलता, अपनापन संतों का गहना होता है हम इसका अनुसरण कर जीवन जिऐं।सद्गुरु दर पर हम हमेशा निमाणे बने रहे तो ही सही मायने में हम सद्गुरु के वचनों पर खरे हैं और परमात्मा की दरगाह में भी स्वीकार किए जाएंगे।
सत्संग के दौरान उमेश,वंश, सानिया,मंजू,लवीना,गुनगुन,हर्षा, चांदनी,नीरज,सरिता,दिशा,दीपक, सर्वेश आदि ने गीत विचार भजन प्रस्तुत किए संत जी का स्वागत केकड़ी ब्रांच मुखी अशोक रंगवानी ने किया संचालन नरेश कारिहा ने किया।