न्यूनतम मजदूरी से भी कम मानदेय पर काम करने को मजबूर है ये कुक कम हैल्पर
मिड डे मील योजना के तहत सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए भोजन पकाने वाले कुक कम हेल्पर के लिए राज्य सरकार द्वारा मानदेय में की गई नाममात्र की बढ़ोतरी ऊंट के मुहं में जीरा वाली कहावत साबित हो रही है। लम्बे समय से मानदेय में बढ़ोतरी करवाने के प्रयासों में जुटे कुक कम हेल्पर अल्प मानदेय को लेकर आर्थिक रुप से परेशान हैं। प्रदेशभर के राजकीय विद्यालयों में मिड डे मील योजना संचालित है। योजना के तहत राजकीय विद्यालयों में बच्चों के भोजन पकाने के लिए कुक कम हेल्पर हैं। बच्चों को तो पौष्टिक आहार मिल रहा है, लेकिन भोजन पकाने वाले को मात्र 1200 रुपए ही मिल रहे है। इसमें भी नब्बे फीसदी महिलाएं कार्यरत है। जो अधिकांश गरीब तबके से हैं।
एक जुलाई से बढ़ेगा दस फीसदी मानदेय
सरकार ने चुनावी वर्ष में प्रदेशभर के कुक कम हेल्पर के लिए दस फीसदी मानदेय बढ़ाने की घोषणा की है। सरकार ने 1 अप्रेल 2017 को इनका मानदेय एक हजार से बढ़ाकर 1200 रुपए किया था। वर्तमान में मिल रहे 1200 रुपए प्रतिमाह मानदेय में सरकार ने 10 फीसदी बढ़ोतरी कर प्रतिमाह 1320 रुपए देने की घोषणा की है। जो 1 जुलाई 2018 से प्रभावी होंगे। कुक कम हेल्पर को ग्रीष्मावकाश व मध्यावधि अवकाश में अवकाश के दिनों की कटौती करके भुगतान करने के आदेश जारी हुए है। अवकाश के दिनों में वे पूरी तरह बेरोजगार हो जाते हैं। अधिकांश स्कूलों मेंं असहाय, बुजुर्ग, विधवा महिलाएं ही कार्य करती है।
अनिवार्यता परेशानी का सबब
सरकार ने सभी स्कूलों में मिड डे मील में गैस कनेक्शन अनिवार्य कर दिया है। जबकि कुक कम हेल्पर को गैस संचालन का अनुभव नहीं है। पाली जिले की डरी ग्राम पंचायत के जबरगढ की ढाणी में हुई दुर्घटना इसका उदाहरण है। दुर्घटना होने पर कुक कम हेल्पर के लिए बीमा राशि का भी कोई प्रावधान नहीं है।
घर खर्च निकालना मुश्किल
महंगाई को देखते हुए इस मानदेय से घर खर्च निकालना मुश्किल भरा काम है। मात्र दस फीसदी बढोतरी ऊंट के मुंह में जीरा है। सरकार को कम से कम दुगुना मानदेय करना था। जिससे वे आर्थिक रुप से शोषित नही हो सके।