संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि पाप से मुक्त हुए बिना शांति का साम्राज्य नहीं मिल सकता है। क्रोध के करण व परिणाम को जानकर हमें क्रोध रूपी पाप का त्याग करना है, इसी में हमारी समझदारी है। हम अभी संपूर्ण रूप से क्रोध का त्याग करने में समर्थ नहीं हो मगर हमें उस पर अंकुश लगाने का प्रयास तो करना चाहिए। इन प्रयासों में सबसे पहला प्रयास है कि हम हमारे उपकारी जनों पर तो कम से कम क्रोध नहीं करें।वैसे तो सहयोग की दृष्टि से तो समस्त 6 काय के जीवो का हम पर उपकार है, मगर मोटे उपकारी माता-पिता गुरु और जिन्होंने व्यापार में ऊपर उठाया, या आजीविका का साधन दिया, कम से कम उन पर तो क्रोध नहीं हो ऐसा प्रयास रहे।
भले ही माता-पिता आपके विरोध में हो, या आपको कितना ही नुकसान पहुंचाते हो, व्यक्ति को उनका उपकार नहीं भूलना चाहिए, कि आज जो में दुनिया देख रहा हूं वह उनकी बदौलत ही है।मैं देखता हूं बहुत बार की व्यक्ति कितने ही लच्छेदार भाषण तो दे देता है मगर घर परिवार में व्यवहार सही नहीं है तो मान लेना कि अभी ज्ञान नहीं सीखा,मात्र ढोंग किया है। याद रखें कि उपकारी का आदर न कर सको तो अवमानना या तिरस्कार तो नहीं होना चाहिए।
दूसरा प्रयास है कि किसी की बात को सुनने से पहले उस पर क्रोध नहीं करें। नौकर या कर्मचारी के थोड़ा सा लेट आने पर कारण को जाने बगैर उस पर क्रोध कर देना।कानून भी पहले सुनवाई करता है,बाद में न्याय देता है।अतः हमें भी पहले बात को सुनना चाहिए।
तीसरा प्रयास की किसी के सामने क्रोध नहीं करे।कोई बात समझानी या कहनी पड़े तो अकेले में कहने या समझाने का प्रयास करें,ताकि सामने वाले के स्वाभिमान की भी रक्षा हो सके।
चौथा प्रयास की भोजन करते समय क्रोध नहीं करना। कोशिश रहे की भोजन के समय कोई फालतू चर्चा आदि नहीं करें।क्योंकि बहुत बार दुकान, काम,धंधे से परेशान व्यक्ति शांति से भोजन करना चाहता है।मगर उस समय किसी चर्चा को छेड़ देने से परेशान होकर हो सकता है वह भोजन ही छोड़ दे,या क्रोध की अवस्था में भोजन करें। और क्रोध की अवस्था में किया गया भोजन लाभ के बजाय नुकसानकारी बन जाता है। अतः भोजन करते समय क्रोध नहीं हो ऐसा प्रयास करें।
इसी के साथ पांचवा प्रयास रहे की क्रोध के आवेग में घर से बाहर नहीं निकले। क्योंकि क्रोध के आवेग में गाड़ी आदि की स्पीड ज्यादा होने से स्वयं व दूसरों को नुकसान पहुंचने की संभावना ज्यादा रहती है। अत:जब चित्त शांत हो जाए, तब ही घर से बाहर निकलने का प्रयास करें।अगर ऐसा प्रयास और पुरुषार्थ रहा तो शांति समाधि और आनंद की स्थितियां बनेगी।
आज की धर्म सभा में ब्यावर भोपालगढ़ आदि स्थानों से श्रद्धालुजनो दर्शन वंदन का लाभ लिया।
श्रीमती शिल्पा जी खटोड़ की बड़ी तपस्या की अनुमोदन हेतु 10 तारीख को पोरसी दिवस,व 11 तारीख को एकासन, आयम्बिल, उपवास ज्यादा से ज्यादा संख्या में करने की प्रेरणा प्रदान की गई।
धर्म सभा को पूज्य श्री सौम्यदर्शन मुनि जी महारासा ने भी संबोधित किया।
धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।
पदमचंद जैन
*मनीष पाटनी,अजमेर*