*मिथ्यात्व रूपी रावण पर विजय प्राप्ति का प्रयास करें: गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि*

संघनायक गुरुदेव श्री प्रियदर्शन मुनि जी महारासा ने फरमाया कि आज आयम्बिल ओली का पांचवा दिवस है।यह नमो लोय सव्व साहुनम की आराधना का दिवस है। लोक के सभी साधुओं को नमस्कार किया गया है साधु तो बहुत है यहां पर किन को? “साहनोति स्व पर कार्याणि इति साधु”जो स्वयं और पर के कार्य को साधता है वह साधु कहलाता है।जो पांच महाव्रत को पालते हैं, पांच इंद्रियों को जीतते हैं, 27 गुणो के धारक है। उनको नमन किया गया है। उनको नमन करने से ही व्यक्ति उनके समान बन सकता है। भीतर के पाप को खत्म करके ही व्यक्ति साधु पद को प्राप्त करता है। विजयदशमी पर व्यक्ति को अपने भीतर बैठे पाप रूपी रावण पर विजय को प्राप्त करना है। हजारों हजार बाहरी शत्रुओं को जीतने वाला भी उतना विजेता नहीं होता है,जितना अपनी आत्मा को जीतने वाला विजेता कहलाता है। 18वें पाप का नाम है मिथ्या दर्शन शल्य।
मिथ्या यानी गलत,दर्शन का अर्थ धर्म व देखना दोनों होता हैऔर शल्य का अर्थ होता है कांटा। जिस प्रकार कांटे के निकले बिना व्यक्ति आगे गति नहीं कर सकता, उसी प्रकार मिथ्यात्व के उदय में व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता है। मिथ्यात्व के सद्भाव में व्यक्ति को असंख्यात काल तक संसार परिवहन करना पड़ सकता है।
मिथ्यात्व के विपरीत सम्यक की प्राप्ति जीव को सात प्रकृतियों के श्योपशम से होती है।
समकिती जीव शत्रु मित्र पर समान भाव रखता है। मोक्ष की तीव्र अभिलाषा रखता है।संसार के प्रति उदासीन होता है। दुखी जीवों के प्रति अनुकंपा करता है। और वीतराग वाणी पर दृढ़ श्रद्धा आस्था रखता है।
मिथ्यात्वी जीव भोग में सुख मानता है। खाओ पियो और मौज करो,यह मान्यता रखता है। भोगी व्यक्ति के लिए कहा है कि भोगी व्यक्ति संसार में परिभ्रमण करता है और योगी व्यक्ति संसार से मुक्त हो जाते हैं।प्रश्न उठता है व्यक्ति को शादी नहीं हुई,इसका रोना ज्यादा आता है या दीक्षा नहीं हुई इसका रोना ज्यादा आता है?अगर शादी नहीं हुई इसका रोना आता है तो आप स्वयं ही अपनी स्थिति पर विचार कर लेना।
मिथ्यात्वी जीव के बारे में कहा गया है कि वह संसार में ही परिभ्रमण करता है,और दुखों को ही प्राप्त करता है।
बाहरी आकर्षण और आसक्ति के कारण व्यक्ति मिथ्यात्व में आगे कदम बढ़ाता है।
इस पाप से बचने के लिए व्यक्ति को ज्यादा से ज्यादा साधु संतों की सत्संगति व सत्साहित्य का पठन करना चाहिए और वीतराग वाणी का निरंतर श्रवण हो ऐसा प्रयास करना चाहिए। ताकि भीतर में बैठे मिथ्यत्व रूपी रावण को दूर किया जा सके।
आज दिन तक एवं आज से पूर्व जो भी मिथ्यात्व रूपी पाप हुए हैं, उन सब का,भगवान की साक्षी से,गुरुदेव की साक्षी से और अपनी आत्मा की साक्षी से मिच्छामी दुक्कडम देते हुए प्रायश्चित करने का प्रयास करें। अगर ऐसा प्रयास व पुरुषार्थ रहा तो आनंद ही आनंद होगा।
प्रवचन प्रभाकर श्रद्धेय श्री वल्लभ मुनि जी महाराज साहब की पुण्य स्मृति दिवस को आयंबील , निवी दिवस के रूप में मनाने की प्रेरणा प्रदान की गई।
धर्म सभा को पूज्य श्री विरागदर्शन जी महारासा ने भी संबोधित किया।
धर्म सभा का संचालन हंसराज नाबेड़ा ने किया।
पदमचंद जैन

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