सफेद लट (गोजा लट) से फसलों को बचाने के लिए किसान अपनाएं वैज्ञानिक उपाय

    खरीफ सीजन में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कीटों में सफेद लट (व्हाइट गर्ब) अथवा गोजा लट किसानों के लिए गंभीर समस्या बन सकता है। यह मिट्टी में रहने वाला हानिकारक कीट है, जिसका लार्वा सफेद रंग का एवं मुड़ी हुई सी आकार का होता है। यह फसलों की जड़ों को खाकर पौधों को कमजोर कर देता है, जिससे पौधे सूखने लगते हैं। यह कीट विशेष रूप से मूंगफली, मक्का, बाजरा, गन्ना, सब्जियां एवं बागवानी फसलों में अधिक नुकसान पहुंचाता है। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को समय रहते इसके नियंत्रण के उपाय अपनाने की सलाह दी है।

ऎसे करें सफेद लट की पहचान

     कृषि विभाग की संयुक्त निदेशक श्रीमती ऊषा चितारा ने बताया कि सफेद लट के प्रकोप से प्रभावित खेतों में पौधे अचानक मुरझाने लगते हैं, पौधा हल्का खींचने पर आसानी से उखड़ जाता है, जड़ों के कटे एवं खाए हुए होने के संकेत मिलते हैं, खेत में जगह-जगह सूखे पौधों के धब्बे दिखाई देते हैं, मिट्टी खोदने पर सफेद रंग की मोटी लट दिखाई देती है।

नियंत्रण के लिए अपनाएं ये उपाय

     खेत में गहरी जुताई करें। गर्मियों में खेत की 2 से 3 बार गहरी जुताई करने से लट एवं प्यूपा धूप के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं। साथ ही पक्षी भी इन्हें खा लेते हैं।

वर्षा के बाद करें बीटल नियंत्रण

     पहली बारिश के बाद शाम के समय पेड़ों पर भृंग (बीटल) आते हैं। किसानों को नीम, बबूल एवं बेर जैसे पेड़ों को हिलाकर बीटल गिराने एवं नष्ट करने की सलाह दी गई है।

लाइट ट्रैप का प्रयोग

      रात्रि में खेतों में लाइट ट्रैप लगाने से बीटल आकर्षित होकर नष्ट किए जा सकते हैं।

जैविक नियंत्रण भी है प्रभावी

     खेत में 100 से 200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से नीम खली का प्रयोग करने से सफेद लट की संख्या कम होती है। इसी प्रकार मेटारिजियम एनिसोप्लिए एवं ब्यूवेरिया बेसिआना जैसे जैविक फफूंदों का उपयोग भी लाभकारी पाया गया है। गेंदा प्रजाति के फूलों की खेती इसके प्रकोप को कम करती है।

रासायनिक नियंत्रण विशेषज्ञ सलाह से करें

     कृषि अधिकारी श्री पुष्पेन्द्र सिंह राठौड़ ने बताया कि विभाग द्वारा किसानों को सलाह दी जाती है कि रासायनिक दवाओं का प्रयोग केवल कृषि विशेषज्ञ की सलाह अनुसार ही करें। सफेद लट नियंत्रण के लिए क्लोरपायरीफॉस 20 इसी अथवा फिप्रोनिल ग्रेन्यूल का उपयोग मिट्टी उपचार में किया जाता है। दवा का प्रयोग सिंचाई के साथ अथवा मिट्टी में मिलाकर किया जा सकता है। बीज उपचार भी लाभकारी रहता है।

बचाव के लिए रखें विशेष ध्यान

      खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था रखें। अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर खाद का ही उपयोग करें। लगातार एक ही फसल लेने के बजाय फसल चक्र अपनाएं। समय पर सिंचाई करें। नियमित रूप से खेतों का निरीक्षण करें तथा प्रारंभिक अवस्था में ही नियंत्रण उपाय अपनाकर फसलों को नुकसान से बचाएं।

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