*महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय में स्थापित होगा ‘राजस्थानी भाषा अध्ययन केंद्र’*

*डॉ. सूरजमल राव बनाए गए समन्वयक*

अजमेर, 29 जुलाई। माननीय राजस्थान के राज्यपाल एवं महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के कुलाधिपति श्री हरिभाऊ बागड़े के मार्गदर्शन तथा लोक भवन से प्राप्त निर्देशों के अनुसरण में महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में ‘राजस्थानी भाषा अध्ययन केंद्र’ की स्थापना की जाएगी। इस महत्वपूर्ण पहल के लिए विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने विश्वविद्यालय में सहायक कुलसचिव एवं राजस्थानी भाषा के अध्येता डॉ. सूरजमल राव को राजस्थानी भाषा अध्ययन केंद्र का समन्वयक नियुक्त किया है।

कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने बताया कि भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषाओं एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में यह विश्वविद्यालय की एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने माननीय कुलाधिपति महोदय के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके दूरदर्शी मार्गदर्शन एवं भारतीय भाषाओं के प्रति विशेष संवेदनशीलता से विश्वविद्यालय को नई दिशा और प्रेरणा प्राप्त हुई है।

प्रो. अग्रवाल ने कहा कि डॉ. सूरजमल राव को राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में उनके दीर्घकालीन योगदान, विशेष रूप से राजस्थानी भाषा के संरक्षण, शोध तथा वंशावलियों के संकलन, अध्ययन एवं प्रलेखन के क्षेत्र में उनके व्यापक अनुभव को दृष्टिगत रखते हुए इस केंद्र की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनके नेतृत्व में यह केंद्र राजस्थानी भाषा के शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं शोधपरक विकास का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा।

उन्होंने बताया कि प्रस्तावित राजस्थानी भाषा अध्ययन केंद्र के माध्यम से राजस्थानी भाषा एवं साहित्य के अध्ययन-अध्यापन, शोध, लोकसाहित्य के संरक्षण, वंशावली साहित्य के वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, पांडुलिपियों के संरक्षण, संगोष्ठियों, व्याख्यानमालाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के साथ सहयोगात्मक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाएगा। साथ ही युवा पीढ़ी को राजस्थानी भाषा एवं राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने के लिए विशेष कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे।

कुलगुरु प्रो. अग्रवाल ने विश्वास व्यक्त किया कि विश्वविद्यालय का यह प्रयास राजस्थानी भाषा को अकादमिक एवं शोध के क्षेत्र में नई पहचान प्रदान करेगा तथा राजस्थान की समृद्ध लोकभाषा, लोकसंस्कृति और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन में मील का पत्थर सिद्ध होगा ।

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