चना की फसल में जड़ गलन, सुखा जड़ गलन एवं उखठा रोग

बचाव के लिए आवश्यक तकनीकी सलाह जारी

अजमेर, 15 अक्टूबर। जिले में रबी सीजन में मुख्य फसलों जैसे कि गेहूं, जौ, चना, सरसों, तारामीरा, जीरा तथा सब्जियों इत्यादि फसलों की बुवाई कार्य किसानों द्वारा किया जाता है। जिले में रबी के मौसम में दलहन फसलों में चने की फसल प्रमुखता से ली जाती है किन्तु किसी फसल का क्षेत्र विशेष में एक ही पैटर्न होने से उसमें लगने वाले कीट-व्याधियों के प्रकोप की भी संभावना भी बढ़ जाती है।

संयुक्त निदेशक कृषि (वि.) श्री संतोष कुमार तंवर के निर्देशन में अवगत करवाया की जिले में चना फसल की बुवाई कार्य मौसम की अनुकूल स्थितियां होने पर अक्टूबर-नवम्बर माह में किए जाते है। इसमें बीजोपचार एवं भुमि उपचार द्वारा कम लागत में कीट व्याधि नियंत्रण के लिए प्रसार के क्रम में कृषि अधिकारी श्री पुष्पेन्द्र सिंह एवं कृषि अनुसन्धान अधिकारी (पौध-व्याधि) डॉ. पुष्पा कँवर कार्यालय एग्री क्लिनिक एवं मृदा परीक्षण प्रयोगशाला अजमेर ने अवगत करवाया की मौसम तथा अन्य अनुकूलता बढ़ने से अन्य कीट व्याधियों के साथ-साथ चने की फसल में मृदा तथा बीज जनित रोग जड़ गलन, सुखा जड़ गलन एवं उखठा रोग जो की हानिकारक फफूंद (फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम) द्वारा फेलते है। उनके होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है। इनका समय रहते उपचार एवं बचाव कार्य नहीं करने पर रोगों की रोकथाम का कार्य काफी दुष्कर एवं खर्चीला या असंभव हो जाता है। इससे फसलों के उत्पाद की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। किसानों को अपने उत्पाद के बाजार भाव भी कम मिलते है। इस रोग का प्रभाव खेत मे छोटे छोटे टुकड़ों मे दिखाई देता है। प्रारम्भ मे पौधे की ऊपरी पतियां मुरझा जाती हैं, धीरे-धीरे पूरा पौधा सूखकर मर जाता है। जड़ के पास तने को चीरकर देखने पर वाहक ऊतकों में कवक जाल धागेनुमा काले रंग की संरचना के रूप में दिखाई देता है। चने की फसल में जड़ गलन, सुखा जड़ गलन एवं उखठा रोग की रोकथाम के लिए विशेषज्ञों द्वारा सुझाए उपाय अपना कर किसान संभावित नुकसान से बच सकते है।

उन्होंने बताया कि भूमि में समुचित जल-निकास की व्यवस्था रहे। पूर्व प्रभावित क्षेत्र में फसल चक्र अपनाएं। सरसों या अलसी के साथ चना की अन्तर फसल लगाना चाहिए। किसान रोग के संभावित क्षेत्रों में चने की रोग रोधी / प्रतिरोधी किस्म जैसे आरएसजी-888, सीएसजेडी-884, आरएसजी-963. आरएसजी-945, आरएसजी-807, आरएसजी-902, आरएसजी-991, जीएनजी-1581, आरएसजी -974, सीएसजेके-6, जीएनजी-1958, सीएसजे-515 तथा सीएसजे-174 इत्यादि का चुनाव करें।

उन्होंने बताया कि भूमि उपचार के लिए बुवाई से पूर्व 2.5 किलो ट्राईकोडर्मा को 100 किलो गोबर की खाद में अच्छी तरह मिलाकर 10-15 दिन तक छाया में रखें। इस मिश्रण को बुवाई के समय प्रति हेक्टेयर की दर से पलेवा करते समय मिट्टी में मिला दें। जड गलन, सूखा जड़ गलन एवं उखठा रोगों की रोकथाम के लिये कार्बन्डाजिम एक ग्राम एवं थाईरम डाई ग्राम या 2 ग्राम कार्बाेक्सीन 37.5 प्रतिशत थाईरम 37.5 प्रतिशत 75 प्रतिशत डब्ल्यू.एस. या 10 ग्राम ट्राईकोडर्मा प्रति किलो बीज की दर से बीज उपचार करें।

उन्होंने बताया कि कृषकों को समय-समय पर कृषि विभाग द्वारा विभिन्न संवाद कार्यक्रमों, गोष्टियो एवं स्थानीय कृषि अधिकारियों, कृषि पर्यवेक्षकों के माध्यम से प्रभावी उपाय बता कर फसलों में होने वाले नुकसान से बचने के लिए जागरूक किया जाता है। अधिक जानकारी के लिए सलाह दी जाती है कि किसान स्थानीय कृषि पर्यवेक्षक, सहायक कृषि अधिकारी या नजदीकी कृषि कार्यालय से संपर्क कर परामर्श उपरांत प्रभावी उपाय अपनाकर कीट-व्याधियों की रोकथाम सम्बंधित कार्य करें।

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