नए न्यास अध्यक्ष भगत के सामने हैं कई चुनौतियां

तकरीबन दस साल तक लंबी राजनीतिक कवायद के बाद और अनेक दुश्मनों से संघर्ष करने के बाद हालांकि कांग्रेस नेता नरेन शहाणी भगत को न्यास अध्यक्ष का पद मिलने की अपार खुशी है, मगर सच्चाई ये है कि अब उनका रास्ता और भी कठिन हो गया है। चाहे राजनीतिक रूप से, चाहे न्यास अध्यक्ष के रूप में कामकाज की दृष्टि से, उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना है।

सब जानते हैं कि यह पद भाजपा शासनकाल में धर्मेश जैन के इस्तीफे के बाद से खाली पड़ा था। जिला कलेक्टर ही पदेन रूप से इस पद का कार्यभार संभाले हुए थे। किसी भी जिला कलेक्टर ने इस दौरान रूटीन के कामों से हट कर विकास के नए आयाम छूने में रुचि भी नहीं दिखाई। असल में न्यास के पदेन अध्यक्ष जिला कलैक्टर को तो न्यास की ओर झांकने की ही फुरसत नहीं है। वे वीआईपी विजिट, जरूरी बैठकों आदि में व्यस्त रहते हैं। कभी उर्स मेले में तो कभी पुष्कर मेले की व्यवस्था में खो जाते हैं। न्यास से जुड़ी अनेक योजनाएं जस की तस पड़ी हैं।

विकास को तरस रहा है अजमेर

नए न्यास अध्यक्ष भगत के लिए निजी तौर पर भले ही नया पद हासिल करने की बेहद खुशी हो, मगर इसी के साथ उन पर महती जिम्मेदारी भी आ गई है। भगत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती ये है कि एक तो उनके पास कांग्रेस शासनकाल की दृष्टि से मात्र दो साल ही बचे हैं। उसमें भी यदि आगामी चुनाव से पहले की कवायद और आचार संहिता को दृष्टिगत रखा जाए तो केवल डेढ़ साल ही धरातल पर काम करने का मौका मिलेगा।

चूंकि लंबे समय से विकास ठप्प पड़ा है और लोगों के ढ़ेरों काम बाकी हैं, इस कारण जनता की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा हैं। विकास तो दूर रोजमर्रा के कामों की हालत भी ये है कि जरूरतमंद लोग चक्कर लगा रहे हैं और किसी को कोई चिंता नहीं। नियमन और नक्शों के सैंकड़ों काम अटके पड़े हैं। पिछले सात साल से लोग न्यास के चक्कर लगा रहे हैं, मगर नियमन के मामले नहीं निपटाए जा रहे। इसका परिणाम ये है कि अपना मकान बनाने का सपना मात्र पूरा होता नहीं दिखाई देता। स्पष्ट है कि विकास अवरुद्ध हुआ है।

पत्रकार कॉलोनी के लिए अरसे लंबित आवेदन उसका ज्वलंत उदाहरण हैं। वर्षों से लम्बित मुआवजा भुगतान, भूमि के बदले भूमि, रूपांतरण, नियमन आदि के हजारों मामल निपटाने के साथ विकास कार्य करवाना और वह भी कम समय में, निश्चित ही चुनौतीपूर्ण है।

भगत के लिए एक बड़ी चुनौती होगी, विकास के लिए पैसा जुटाने की। न्यास की संपत्तियों की ठीक रखरखाव के साथ भू-माफियाओं के चंगुल से न्यास की भूमि को मुक्त करवाना बेहद कठिन काम है। उसके लिए उन्हें दृढ़ इच्छा शक्ति दिखानी होगी, क्योंकि जैसे ही कोई काम शुरू किया जाता है तो अनके राजनीतिक-गैरराजनीतिक दबाव झेलने होते हैं।

अब देखना ये है कि वे जनता की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरते हैं। जहां तक लोगों की प्रतिक्रिया का सवाल है जैसे ही भगत के नाम की घोषणा हुई, यह एक आम प्रतिक्रिया थी कि देर से ही सही मगर एक साफ-सुथरे व्यक्ति को शहर के विकास का जिम्मा सौंपा गया है। ऐसे में उम्मीद तो यही की जानी चाहिए कि उनकी नियुक्ति शहर के विकास का नया द्वार खोलेगी।

टांग खिंचाई का क्या करेंगे भगत?
भगत के लिए दूसरी बड़ी मुश्किल है, अपने ही साथी कांग्रेसी नेताओं से तालमेल बैठाने की। जाहिर तौर पर जब इस पद के दावेदार सभी प्रमुख नेता थे और उन्हें यह पद नहीं मिला तो वे कितने खिंचे-खिंचे से होंगे। पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती को कितनी तकलीफ हुई, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे भगत के शपथ ग्रहण समारोह तक में नहीं थे।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से नजदीकी के कारण अजमेर के मिनी सीएम के रूप में जाने जाते हैं। वे भी प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे, मगर धुर विरोधी भगत को कुर्सी मिल गई तो तकलीफ होनी ही थी। उन्होंने खूब शिकायत की कि भगत ने उन्हें हरवाने में अहम भूमिका निभाई, मगर गहलोत ने फिर भी भगत को ही इनाम दिया। ऐसे में बाहेती से भगत सहयोग की उम्मीद तो दूर, उलटा फिश प्लेंटे गायब करवाने की आशंका ही ज्यादा नजर आती है।

न्यास पहले ही घोटालों का अड्डा बना हुआ है। लोग फर्जी सीडी की वजह से निपेट धर्मेश जैन को अभी भूले नहीं हैं। एक तो बेदाग बने रहने की जरूरत है, दूसरा गिनाने लायक काम करने हैं। एक अखबार ने तो उनके सामने पूर्व अध्यक्ष औंकार सिंह लखावत की लकीर खींच रखी है। हालांकि अन्य सभी नेता शपथ ग्रहण समारोह में आए, मगर सच्चाई ये है कि उन्हें भी तकलीफ तो है ही। इन सभी से तालमेल बैठा कर चलना आसान काम नहीं है।

कुल मिला कर चुनौती बड़ी है। उससे भी बड़ी बात ये है कि उनका असल राजनीतिक कैरियर ही अब शुरू हुआ है। वे विधायक बनने का सपना पाले हुए हैं। अगर ठीक से काम किया तो ही टिकट की उम्मीद कर सकते हैं। जीतने का ग्राउंड भी तैयार कर सकते हैं। परफोरमेंस ठीक नहीं रहा तो राजनीतिक कैरियर पर फुल स्टॉप की खतरा है। इस बात को उन्हें भी अहसास है, इस कारण सावधान तो हैं, मगर देखते हैं कामयाब कितना हो पाते हैं।

बड़ी मुश्किल से हासिल किया है ये पद
सब जानते हैं कि नगर सुधार न्यास का अध्यक्ष बनने की लाइन में कांग्रेस के कई नेता थे। सबसे पहले स्थान पर नाम था मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती का, मगर बीस सूत्रीय कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति में उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद उनकी संभावना कुछ क्षीण हो गई थी। हालांकि इसके बाद भी आखिरी समय तक उनका नाम चलता रहा। इसी प्रकार महेंद्र सिंह रलावता, डॉ. लाल थदानी, दीपक हासानी, ललित भाटी, डॉ. राजकुमार जयपाल आदि भी लाइन में थे।

रलावता को चूंकि शहर कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया गया, इस कारण उनका नाम कटा हुआ माना जा रहा था। दीपक हासानी का नाम अलग वजह से कटा। चूंकि वे गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत करीबी हैं और उनका नाम जमीन घोटाले में घसीटा गया, इस कारण साफ हो गया कि गहलोत अब कोई रिस्क नहीं लेंगे। रहा सवाल डॉ. राजकुमार जयपाल का तो जाहिर तौर पर उनके लिए संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट राजी नहीं थे, क्योंकि शहर कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर डॉ. जयपाल गुट ने काफी परेशान किया था।

रलावता की ताजपोशी के बाद उनका नाम भी यूआईटी के दावेदारों की सूची से कट गया था। ललित भाटी को राष्ट्रीय स्तर पर नरेगा संबंधी कमेटी लेने के बाद उनका नाम भी सूची से कट गया। आखिरी दौर में हालांकि पूर्व विधायक डॉ. के. सी.चौधरी का नाम उभरा, मगर स्थानीय वैश्य नेताओं ने उनका विरोध कर किसी स्थानीय वैश्य को बनाने का दबाव बना दिया। ऐसे में वैश्य महासभा के नेता कालीचरण खंडेलवाल का भी उभरा और उनका नाम ही फाइनल माना जा रहा था, मगर उनकी भी कारसेवा हो गई।

आखिरकार भगत का नंबर आ गया। समझा जाता है कि विधानसभा चुनाव में गैर सिंधी के रूप में डॉ. बाहेती को अजमेर उत्तर का टिकट देने के कारण सिंधियों में उपजी नाराजगी को दूर करने को भी कांग्रेस हाईकमान ने ध्यान में रखा है।

कौन हैं नरेन शहाणी भगत?
मूल रूप से होटल व ब्रेड व्यवसायी श्नरेन शहाणी भगत यूं तो अरसे से समाजसेवक के रूप में जाने जाते हैं। श्री भगत का जन्म 5 अप्रैल 1961 को प्रसिद्ध समाजसेवी श्री नत्थूलाल शहाणी के घर हुआ। स्नातक तक शिक्षा अर्जित करने के दौरान ही उन्होंने अपने पैतृक व्यवसाय की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया।

लक्ष्मी बैकर्स प्राइवेट लिमिटेड व लक्ष्मी होटल के प्रोपराइटर शहाणी अपने पिता की ही तरह सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़ कर रुचि लेने लगे। वे वर्तमान में संत कंवरराम मंडल और संत कंवरराम एज्यूकेशनल सोसायटी के अध्यक्ष हैं, जिसके तहत सीनियर सेकंडरी स्कूल व धर्मशाला का संचालन किया जाता है।

इसके अतिरिक्त अजमेर सिंधी सेंट्रल पंचायत के अध्यक्ष, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य, कांग्रेस के जिला लघु उद्योग प्रकोष्ठ के अध्यक्ष, सिंधी काउंसिल ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष, पूज्य पारब्रह्म मंदिर के ट्रस्टी, संत कंवरराम हाउसिंग सोसायटी के सलाहकार, अजमेर बेकरी एसोसिएशन के अध्यक्ष, आदर्श विद्या समिति व प्रेम प्रकाश मंडल के कार्यकारिणी सदस्य और क्लॉक टावर व्यापार संघ के अध्यक्ष हैं। साथ ही श्रीनगर रोड रहवासी संघ के सलाहकार, लायंस क्लब मेन के ट्रस्टी व अजमेर जिला लघु उद्योग संघ के निदेशक हैं।

सन् 2003 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस अजमेर पश्चिम से अपना प्रत्याशी बनाया, लेकिन दुर्भाग्य से तत्कालीन विधायक श्री नानकराम जगतराय के बागी प्रत्याशी के रूप में मैदान में होने के कारण वे पराजित हो गए। उसके बाद भी वे लगातार सक्रिय बने रहे हैं।

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