आखिकार गौरी लंकेश पत्रकार थी

तेजवानी गिरधर
तेजवानी गिरधर
इन दिनों पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या को लेकर सोशल मीडिया पर जम कर बवाल हो रहा है। खासकर इसलिए कि जैसे ही यह तथ्य सामने आया कि वह वामपंथी विचारधारा की थी, इसी कारण दक्षिपंथियों ने उसकी हत्या कर दी तो अब दक्षिणपंथी लगे हैं यह साबित करने में कि उसकी हत्या नक्सलपंथियों ने की। बेशक, यह कोर्ट को ही तय करना है कि आखिर उसकी हत्या किसने की, मगर जिस प्रकार दक्षिणपंथी पत्रकार मामले को ट्विस्ट दे रहे हैं, तर्क के निम्नतम स्तर पर जा रहे हैं, उससे लगता है कि वे अपने मौलिक पत्रकार धर्म को छोड़ कर विचारधारा मात्र को पोषित करने में लगे हुए हैं। यह ठीक है कि वे हत्या पर दुख भी जता रहे हैं, मगर उनकी भाषा में हमदर्दी तनिक मात्र भी नजर नहीं आती। कुछ तो इंसानियत की सारी मर्यादाएं तोड़ कर इस हत्याकांड पर खुशी तक जता रहे हैं।
गौरी लंकेश आखिरकार पत्रकार थीं। उनकी कलम के बारे में कहा जा रहा है कि वह संयमित नहीं थी, तो इसका मतलब ये नहीं है कि कानून तोड़ कर कुछ लोग उसकी हत्या कर दें। किसी को अधिकार नहीं की कलम के विरोध स्वरूप गोली मार दे, यदि आपको किसी की लेखनी से नाराजगी है तो अदालत और कानून है। अगर इस प्रकार विचारधारा विशेष के लोग सजा देने का अधिकार अपने हाथ में ले लेंगे तो फिर कानून की जरूरत ही क्या है? तो फिर इस लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या होगा? तो फिर असहिष्णुता का सवाल उठाया जाता है, वह पूरी तरह से जायज है।
चलो, इस मसले को अब जबकि पूरा राजनीतिक रंग मिल चुका है, तो इससे हट कर भी विचार कर लें। फेसबुक पर एक पत्रकार ने अपना दर्द बयान करते हुए लिखा है कि अगर किसी पत्रकार पर हमला होता है तो पत्रकार संघ इसके विरोध में मात्र ज्ञापन देने एवं आलोचना की खबर प्रकाशित करने के अलावा कुछ भी नहीं करते हैं। अति महत्वाकांक्षा के इस दौर में खबर एवं विज्ञापन के लालच में हम स्वयं ही एक दूसरे के विरोधी बन जाते हैं। प्रशासन के वो ही अधिकारी जो अन्य मामलों में पत्रकारों से सहयोग की अपील करते हुए देखे जाते हैं, वो ही ऐसे मामलों में पत्रकारों से कभी सहयोग नहीं करते। जनता भी कभी पत्रकार के फेवर में देखी नहीं गई। जब फोटो या नाम छपवाना हो तो पत्रकारजी होते हैं, वरना वो कभी भी पत्रकार के दु:ख दर्द में साथी नहीं होती। उनकी बात में दम है।
एक पत्रकार साथी ने तो और खुल कर लिखा है कि किस प्रकार पत्रकार की सेवाएं तो पूरी ली जाती हैं, मगर जब उस पर विपत्ति आती है तो उसकी सेवाओं को पूरी तरह से नकार दिया जाता है:-
लड़ाई हो तो पत्रकारों को बुलाओ
सड़क नहीं बनी पत्रकारों को बुलाओ
पानी नहीं आ रहा पत्रकारों को बुलाओ
नेतागिरी में हाईलाइट होना है तो पत्रकारों को बुलाओ
नेतागिरी चमकानी हो तो पत्रकरों को बुलाओ
पुलिस नहीं सुन रही तो पत्रकारों को बुलाओ
प्रशासन के अधिकारी नहीं सुन रहे पत्रकारों को बुलाओ

जनता की हर छोटी मोटी समस्या के लिए पत्रकार हमेशा हाजिर हो जाते हैं और अपने कर्तव्यों का निर्वहन बखूबी करते हैं, पर जब पत्रकारों पर हमला होता है, उनकी हत्या की जाती है, तब आमजन क्यों नहीं पत्रकारों का साथ देने आगे आते हैं? जरा सोचिए, पत्रकार भी आपके समाज का हिस्सा है, फिर पत्रकारों पर हमले का विरोध सिर्फ पत्रकार ही करते हैं, बाकी क्यों नहीं करते?
कुल जमा बात ये है कि किसी पत्रकार की हत्या को जायज ठहराने अथवा किसी और पर आरोप मढऩे से भी अधिक महत्वपूर्ण ये है कि गौरी लंकेश आखिरकार पत्रकार थी। इस प्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अगर छीनी जाती रहेगी तो इस देश में लोकतंत्र को बचाना मुश्किल हो जाएगा।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

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