नए अवतार में आएंगे लाला बन्ना?

surendra singh shekhawatअजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत उर्फ लाला बन्ना की भाजपा में वापसी से ऐसा प्रतीत होता है कि सब कुछ पहले जैसा सामान्य हो जाएगा, मगर जिस घटनाक्रम के बाद वे लौटे हैं, उससे इस बात की संभावना अधिक है कि वे लाला बन्ना का दूसरा संस्करण या दूसरा अवतार होंगे।
वस्तुत: कोई ये कह सकता है कि किसी भी राजनीतिक व्यक्ति के लिए अंतत: मूल धारा में आना मजबूरी होता है, अत: वह हालात से समझौता कर लेता है, मगर जिस प्रकार का लाला बन्ना का व्यक्तित्व है, वे भाजपा में लौटने मात्र के लिए नहीं लौटे हैं। सब जानते हैं कि वे कितने ऊर्जावान और महत्वाकांक्षी हैं। भाजपा में ही ऐसे बहुत से हैं, जो भाजपा में रहते हुए भी मृतप्राय: हैं, मगर लाला बन्ना भाजपा से बाहर रहते हुए भी अपने वजूद को जिंदा रखे हुए रहे। उनकी अपनी फेन्स फॉलोइंग है, जिसने उन्हें विस्मृत नहीं होने दिया। इस बीच संजीदगी व गंभीरता भी बढ़ी है, लिहाजा पक्का मान कर चलिए कि इस बार बड़ी चतुराई से मोहरे खेलेंगे। और उसकी वजह भी है, वे केवल स्थानीय स्तर पर जिंदा नहीं है, बल्कि ऊपर भी उनके तार बहुत मजबूत हैं। यानि कि अब लाला बन्ना का नया अवतार सामने आना वाला है।
रहा सवाल स्थानीय समीकरणों का, तो कुछ लोग यह मान कर चल सकते हैं कि चूंकि वे पूर्व में महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल के खास सिपहसालार रहे, इस कारण अब भी शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी विरोधी सेना के सेनापति होंगे ही, ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। कहते हैं न कि रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय, टूटे से फिर न ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय। इसकी वजह ये है कि भाजपा में औपचारिक तौर पर भले ही वापसी अब जा कर हुई, मगर वास्तविक सुलह तो नगर निगम के महापौर धर्मेन्द्र गहलोत से हाथ मिला कर हो गई थी। तभी ये तय हो गया था कि वे देर-सवेर भाजपा में शामिल होंगे, अन्यथा सुलह की जरूरत ही क्या थी? बाद में जिस प्रकार भाजपा के दिग्गज नेता ओम प्रकाश माथुर के अजमेर आगमन पर उनकी जो जिंदादिल मौजूदगी थी, वह इस बात का प्रमाण थी कि वापसी सुनिश्चित है। खैर, गहलोत के साथ सुलह राजगढ़ भैरोंधाम के मुख्य उपासक चंपालाल जी महाराज की पहल पर हुई या फिर दोनों सुलह चाहते थे, किसका इनीशियेटिव था पता नहीं, मगर इतना तय है कि सुलह के साथ उन दोनों के बीच कुछ तो तय हुआ ही होगा। ऐसे में यह सुनिश्चित तौर पर नहीं कह सकते कि लाला बन्ना फिर पुराने समीकरणों में समाहित हो जाएंगे। असल में भाजपा से बाहर रह कर उन्हें इस बात का भी ठीक अनुमान हो गया होगा कि उनकी राजनीतिक भलाई कैसा रोल अदा करने में है? कौन अपना और कौन पराया है? सबसे बड़ी बात ये है कि नीचे से ऊपर वे जिस लॉबी के हिस्से रहे हैं, वह कोई कमजोर लॉबी नहीं है। और उसमें भी वे कमजोर स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि वे किसी नई रणनीति के सूत्रधार होंगे। चूंकि उनमें पहले से अधिक परिपक्वता आई होगी, इस कारण लगता नहीं कि वे भावावेश में गैर सिंधीवाद की मुहिम का हिस्सा होंगे या मेयर बनने के लिए विरोधियों से हाथ मिलाने जैसा कदम उठाएंगे। बेशक अजमेर में गैर सिंधी व गैर अनुसूचित जाति के नेताओं के लिए सीमित संभावनाएं हैं, मगर उन सीमित संभावनाओं में भी वे अपने लिए स्थान सुनिश्चित कर लेंगे, ये मान कर चला जा सकता है।
-तेजवानी गिरधर
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