अनादि सरस्वती होंगी अजमेर उत्तर से भाजपा प्रत्याशी?

विश्व हिंदू परिषद कोटे में जुड़ गया है उनका नाम
अजमेर उत्तर के भाजपा टिकट के दावेदार भले ही जयपुर की रायशुमारी से खुश हों कि उनकी दावेदारी पेश हो चुकी है और उनमें से ही किसी को टिकट मिलेगा, मगर कानाफूसी है कि साध्वी अनादि सरस्वती का नाम उस पेनल में शामिल हो गया है, जहां अंतिम फैसला होगा, जबकि उन्होंने विधिवत दावा पेश नहीं किया है। बेहद गुप्त रूप से चर्चा है कि विश्व हिंदू कोटे में उनका नाम जोड़ा गया है, अर्थात उनका नाम उस सूची में है, जिसमें साधु-साध्वियों के नाम हैं। उनका नाम अजमेर उत्तर से होने का आधार ये है कि वे सिंधी समुदाय से हैं। उनका मूल नाम ममता कालानी है। बकौल ममता, वे स्वाधीनता सेनानी हेमू कालानी के परिवार से हैं। चूंकि भाजपा किसी सिंधी को टिकट देती आई है और इस बार शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का टिकट कटने की चर्चा है, इस कारण संभव है कि उन्हें चुनाव मैदान में उतार दिया जाए। वे सिंधी, महिला व साध्वी कोटे को पूरा करती हैं। साथ ही बेहद आकर्षक और चुंबकीय व्यक्तित्व की धनी हैं।
ज्ञातव्य है कि साध्वी अनादि सरस्वती का नाम काफी दिन से चर्चा में है। हालांकि उन्होंने न तो इस आशय का कोई संकेत दिया और न ही पुष्टि की, मगर जिस तरह से पिछले कुछ दिन से उनकी उपस्थिति आरएसएस व भाजपा के कार्यक्रमों में रही, उससे इस संभावना को बल मिला कि वे राजनीति में रुचि ले सकती हैं। शहर के जाने-माने राजनीतिक पंडित एडवोकेट राजेश टंडन ने तो दो-तीन बार इसका इशारा सोशल मीडिया में कर दिया कि वे अजमेर उत्तर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ेंगी। टंडन ने अपनी खबर को पुख्ता आधार देने के लिए साध्वी की हाल की गतिविधियों की ओर भी इशारा किया। जैसे जयपुर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को उनका आशीर्वाद देना, राज्यसभा सदस्य भूपेन्द्र यादव से उनकी शिष्टाचार भेंट इत्यादि। इसके अतिरिक्त विश्व हिंदू परिषद व संघ के कार्यक्रमों में उनके मंचों पर भी उन्हें देखा गया। इसके अलावा रायपुर-छत्तीसगढ की यात्रा के दौरान उनकी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मुलाकात को भी उन्होंने इसी संदर्भ में जोड़ा।
हालांकि उस वक्त इस उड़ती खबर पर किसी ने यकीन नहीं किया, मगर सुविज्ञ सूत्रों के अनुसार उनके संपर्क अब स्थानीय से हट कर ऊपर तक पहुंच गए हैं। बताया जाता है कि संघ के एक प्रचारक के माध्यम से उनकी पैठ विश्व हिंदू परिषद के उच्च पदाधिकारियों में हो गई है।

मोहन भागवत के साथ
ज्ञातव्य है कि पिछले कुछ वर्षों में वे शहर की गिनी-चुनी संभ्रांत शख्सियतों में शुमार हो चुकी हैं। समारोहों में भले ही वे यदा-कदा दिखाई दें, मगर फेसबुक पर वे छायी रहती हैं। उनकी मंत्रमुग्ध करने वाली पिक्चर्स पर लाइक करने वालों की लंबी फेहरिश्त होती है।
बहरहाल, जैसे ही भाजपा के चंद दावेदारों को यह उड़ती हुई सूचना मिली है कि वे पेनल में शामिल हैं, वे मामले की तह में जाने में जुट गए हैं। जानकारी तो ये है कि पिछले दिनों भी जब अनादि का नाम अफवाहों में आया था तो जैसा कि राजनीति में होता है, कुछ लोगों ने उनकी कुंडली के रहस्य जुटाना शुरू कर दिए थे। कहते हैं न कि अगर आपको अपने पुरखों के बारे में जानकारी न हो तो अपना नाम टिकट की दावेदारी में पेश कर दो, लोग आपकी सात पीढ़ी की कारगुजारियों को ढूंढ़ निकालेंगे। उनके साथ भी कुछ ऐसा ही होता नजर आ रहा है। उनके सांसारिक जीवन की जानकारियां जुटाई जा रही हैं। मकसद सिर्फ इतना है कि कोई नकारात्मक तथ्य मिल जाए तो उनको ऊपर भेजा जाए। हालांकि आम तौर पर उनका व्यवहार मर्यादित ही रहा है, मगर फेसबुक पर जिस तरह से भिन्न-भिन्न भाव-भंगिमाओं व मुद्राओं के चित्र वे शेयर करती हैं, उसको लेकर टीका-टिप्पणियां होती रहती हैं। फोटोज से साफ नजर आता है कि साध्वी होते हुए भी वे अपने रूप सौंदर्य के प्रति बेहद सजग हैं।

जसराज जयपाल के साथ
एक तथ्य जरूर सही प्रतीत होता है कि उन्हें देवनानी की काट के लिए भाजपा की एक लॉबी ने तलाशा था। न केवल तलाशा, अपितु प्रमोट भी किया। वह लॉबी यूं तो एंटी सिंधी लॉबी है, मगर उनके निशाने पर मूल रूप से केवल देवनानी हैं। इस लॉबी के कुछ नेता गैर सिंधीवाद के नाम पर टिकट के लिए घात लगा कर बैठे हैं, मगर यदि भाजपा हाईकमान सिंधी प्रत्याशी पर ही अड़ी रहती है तो देवनानी के विकल्प के रूप में अनादि को आगे करने का मानस रखते हैं। यूं शुरुआती दौर में कुछ प्रमुख कांग्रेसी नेताओं से भी उनके संपर्क रहे हैं।
बहरहाल, अगर उन्हें टिकट मिल जाता है तो सबसे पहली दिक्कत ये आएगी कि आम जनता तक उनकी कोई पहचान नहीं है। अभिजात्य वर्ग में भी सीमित लोग ही उनके संपर्क में हैं। जाति से सिंधी हैं जरूर, मगर सिंधियों में उनकी कोई खास पकड़ नहीं। रहा सवाल राजनीतिक चुतराई का तो वह बिलकुल शून्य है। यानि कि उनके पास खुद की कोई सूझबूझ नहीं, संगठन को ही उनके चुनाव का सारा प्रबंधन संभालना होगा। खतरा ये है कि उनके सांसारिक जीवन से जुड़े झूठे-सच्चे कहानी-किस्से सामने न आ जाएं। और फायदा ये है कि देवनानी के प्रति जो एंटी इन्कंबेंसी है, वह फेस नहीं करनी पड़ेगी। बाकी भाजपा सरकार के प्रति जो नाराजगी है, वह तो झेलनी ही होगी।
खैर, पत्ते खुलने में अब बाकी ज्यादा दिन शेष नहीं रहे हैं, जल्द ही धुंध हट जाने वाली है।

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