लीज को लेकर लटके हुए हैं दुकानदार

अजमेर नगर निगम के तकरीबन आठ सौ किरायेदार दुकानदार पिछली सरकार के दौरान जारी हुए लीज के आदेश अमल में नहीं लाए जाने के कारण लटके हुए हैं। चूंकि आदेश की अवधि 31 दिसंबर 2018 को ही समाप्त हो गई थी, इस कारण निगम को अब नए आदेशों का इंतजार है। स्वाभाविक रूप से निगम की दुकानों के किरायेदार दुकानदार भी उसी के इंतजार में बैठे हैं।
असल में निगम के इन किरायेदार दुकानदारों का दुकानों को लीज में कनवर्ट किए जाने का मसला काफी दिन से लटका पड़ा था। कई दौर की वार्ता के बाद लीज के बारे में सहमति तो हो गई, मगर फाइल पूर्व स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी के पास अटकी रही। जब फाइल मुख्यमंत्री के पास भेजी गई तो वहां से भी आदेश जारी होने में देरी हो गई। आदेश जारी होते ही दुकानदारों को राहत की उम्मीद बंधी, मगर इसी दौरान विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने के कारण मामला अटका रहा। इस बीच आयुक्त का तबादला हो गया। नए आयुक्त को मामला समझने के लिए वक्त चाहिए था। जैसे ही आचार संहिता समाप्त हुई तो तुरत-फुरत में लीज की कार्यवाही आरंभ की गई, मगर औपचारिकताएं अधिक होने के कारण उसे 31 दिसंबर तक पूरा करना संभव नहीं रहा। हालांकि मेयर धर्मेन्द्र गहलोत चाहते थे कि कैसे भी आदेश पर अमल करवा लिया जाए, मगर संभवत: निगम प्रशासन का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाया। ज्ञातव्य है कि इस मामले में पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी ने विशेष रुचि ली थी। उन्होंने बाकायदा दुकानदारों की बैठक भी ली। उन्हें उम्मीद थी कि दुकानदारों का काम करने से वोटों का लाभ मिलेगा। स्वाभाविक रूप से मिला भी। मगर अब आदेश की अवधि समाप्त हो जाने व सरकार बदल जाने के कारण मामला अटक गया है। इस बारे में निगम ने डायरेक्टर से मार्गदर्शन मांगा है, मगर समझा जाता है कि इस मामले में अब स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल नए सिरे से विचार करेंगे। हालांकि वे चाहें तो पिछले ही आदेश की अवधि बढ़ा सकते हैं, मगर लगता यही है कि वे आदेश की फिर से समीक्षा करेंगे। दुकानदारों को भी लगता है कि अब धारीवाल रुचि लेंगे, तभी कुछ हो पाएगा, इस कारण वे उनसे संपर्क करने और दबाव बनाने की जुगत में लग गए हैं। इसके लिए वे विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल कर रहे हैं। चूंकि पांच माह के भीतर लोकसभा चुनाव होने हैं, इस कारण दुकानदारों को उम्मीद है कि वोटों की चाहत में कांग्रेस सरकार जरूर राहत प्रदान करेगी। दिक्कत सिर्फ इतनी है कि यदि इस पर जल्द से जल्द फैसला नहीं हुआ तो आचार संहिता फिर से लागू हो जाएगी, और मामला फिर से लटक जाएगा। दुकानदारों का प्रयास है कि कैसे भी आचार संहिता लागू होने से पहले कार्यवाही पूरी हो जाए।

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