टिकट लेने में इसलिए दिक्कत आ रही है सारस्वत को

बी पी सारस्वत
इसमें कोई दोराय नहीं कि जाट बहुल अजमेर संसदीय सीट होने के बावजूद सांगठनिक दृष्टिकोण से भाजपा टिकट का सबसे मजबूत दावा देहात जिला भाजपा अध्यक्ष प्रो. बी. पी. सारस्वत का है।
पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा व श्रीमती सरिता गैना, पूर्व विधायक भागरीथ चौधरी, शहर भाजपा अध्यक्ष शिवशंकर हेड़ा, अजमेर नगर निगम के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत, पूर्व जिला प्रमुख श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के पति युवा नेता भंवर सिंह पलाड़ा, आईटी स्पेशलिस्ट आशीष चतुर्वेदी, पूर्व प्रधान रामेश्वर प्रसाद कड़वा, डॉ. दीपक भाकर, विकास चौधरी, ओम प्रकाश भडाणा व सुभाष काबरा आदि की तुलना में संगठन पर सर्वाधिक पकड़ सारस्वत की है। देहात जिला अध्यक्ष पद पर होने के नाते ही नहीं, अपितु संगठन में ठेठ कार्यकर्ता तक काम करने के अनुभव के लिहाज से भी वे ही सर्वाधिक उपयुक्त दावेदार हो सकते हैं। आज देहात में जो संगठन है, उसको गठित करने में उनकी ही भूमिका है। यदि ये कहा जाए कि इसी योग्यता के चलते वे विधानसभा चुनाव में टिकट लेने से वंचित हो गए, तो कोई बहुत ज्यादा अतिशयोक्ति नहीं होगी। बेशक उनके अध्यक्ष रहते पिछले लोकसभा उपचुनाव में देहात की सभी छहों सीटों पर भाजपा पराजित हुई, जिसकी वजह ये मानी जाती है, खुद भाजपाई भी मानते हैं कि भाजपा उम्मीदवार रामस्वरूप लांबा कॉम्पीटेंट केंडिडेट नहीं थे, मगर उसके बाद विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर हुआ, जिसका श्रेय स्वाभाविक रूप से सारस्वत को दिया जाता है। न केवल आम भाजपा कार्यकर्ता उनको सर्वाधिक दमदार दावेदार मानता है, अपितु वे स्वयं भी इस अहसास में जी रहे हैं कि टिकट उनको ही मिलेगा। समझा जाता है कि उन्हें इस बार भी पिछले आम चुनाव की तरह मोदी लहर चलने की उम्मीद होगी। बावजूद इसके यदि नागौर के सांसद सी. आर. चौधरी का नाम टॉप पर चल रहा है तो जरूर उसका कोई कारण होगा।
यह ठीक है कि चौधरी को नागौर से आयातित किया जाता है तो यह अजमेर के स्थानीय भाजपा दावेदारों व कार्यकर्ताओं का अपमान करार दिया जाना वाजिब है, मगर पार्टी के साथ दिक्कत ये है कि उसके पास इस जाट बहुल सीट के लिए मौजूदा जाट दावेदारों में से सर्वाधिक मजबूत सिर्फ चौधरी ही हैं। उन जैसे अनुभवी नेता को अगर पार्टी संसद में ले जाना चाहती है तो उसे इस तथ्य को भी नजर अंदाज करना पड़ सकता है कि वे अपने गृह जिले नागौर में पकड़ खो चुके हैं। विधानसभा चुनाव में वहां की दस में आठ सीटों पर भाजपा की हार इस बात का प्रमाण है। जानकारी के अनुसार जैसे ही उनका नाम ऊपर आया है, सारस्वत सहित अन्य दावेदारों ने भीतर ही भीतर उनका विरोध शुरू कर दिया है। यह बात दीगर है कि इसके बाद भी यदि चौधरी को टिकट दिया जाता है तो ये ही सारस्वत पूरे देहात में उनके लिए मुस्तैदी से काम करेंगे।
खैर, फिर से बात करते हैं सारस्वत की दावेदारी की। चूंकि पिछले उपचुनाव में डॉ. रघु शर्मा के जीतने से यह तथ्य स्थापित हुआ कि यह सीट ब्राह्मणों के लिए उपयुक्त है, इसी आधार पर सारस्वत दावा ठोक रहे हैं। हालांकि उस चुनाव व इस चुनाव के समीकरणों में अंतर है। यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि जिस प्रकार शर्मा का भाजपा मानसिकता के ब्राह्मणों भी ने साथ दिया था, ठीक उसी प्रकार कांग्रेस मानसिकता के ब्राह्मण भी सारस्वत का साथ देंगे। वो भी तब जब कि ब्राह्मण नेता के तौर पर डॉ. शर्मा स्थापित हो चुके हैं। वे वर्तमान में राज्य सरकार में केबीनेट मंत्री हैं। इतना ही नहीं, वे राजस्थान में कांग्रेस के चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष भी हैं। जाहिर तौर पर सत्ता की वजह से उनके इर्दगिर्द ब्राह्मण लॉबी लामबंद हो चुकी है। भले ही उन्होंने अपने चुनाव में भाजपा मानसिकता के वोट झटक लिए हों, मगर ब्राह्मण होने के नाते सारस्वत को कोई एडवांटेज देने वाले नहीं हैं। अगर सारस्वत ये दावा करते होंगे कि वे सभी ब्राह्मणों वोट हासिल कर सकते हैं तो यह रघु शर्मा के रहते कमजोर ही है। और एक मात्र यही वजह उनके टिकट के दावे को कमजोर किए हुए है।
-तेजवानी गिरधर
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