अजमेर के अन्ना हजारे बनना चाहते हैं राजेश टंडन?

वरिष्ठ एडवोकेट राजेश टंडन अपने किस्म के अनूठे प्राणी हैं। जीवन में जितने भी उतार-चढ़ाव संभव हैं, वे देख चुके हैं। राजनीति हो या सामाजिक क्षेत्र, धार्मिक हो या खेल जगत, ऐसा कोई फील्ड नहीं है, जहां उन्होंने घोटा नहीं घुमाया हो। कितनी बार, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं। जवाहर रंगमंच उनकी ही पहल का नतीजा है। बजरंगगढ़ स्थित अंबे माता मंदिर भी उनकी ही देन है। शहर का शायद ही कोई वीआईपी बचा हो, जिसने यह देवरा नहीं ढ़ोका हो। बाहर से आने वाले विशिष्ट हस्तियों को भी येन-केन-प्रकारेण शीश झुकवा ही देते हैं। सांप्रदायिक सौहार्द के लिए हर साल रोजा अफ्तार पार्टी के बहाने शहर भर की हस्तियों का अपने घर पर मजमा लगाते हैं। उनकी उपलब्धियों में परबतपुरा चौराहे पर ट्रेफिक सर्किल बनवाना, भारतीय सैनिकों के सिर काटे जाने पर पाक प्रधानमंत्री परवेज मुशर्रफ को अजमेर में न घुसने देने की चेतावनी देना, चीनी वितरित नहीं होने पर भूख हड़ताल पर बैठना, गुर्जरों को आरक्षण दिलवाने के लिए खम ठोक कर साथ देना, अजमेर जिला एवं सत्र न्यायालय के लिए संयोगिता नगर की जमीन लेना, ख्वाजा साहब की दरगाह में पूरे इन्तजामात नहीं होने पर तीन दिन भूख हड़ताल पर बैठना जैसे कई काम शामिल हैं।
वे कितने मुंहफट हैं, इसका पता उनका हर परिचित व्यक्ति जानता है। आम बोलचाल की भाषा के अलंकृत शब्द उनके श्रीमुख से धाराप्रवाह प्रस्फुटित होते तो कई ने देखा होगा। फेसबुक पर उनकी पोस्टें नए लौंडों को भी मात देती हैं। पूर्व जिला कलेक्टर सरीखी नगर निगम आयुक्त चिन्मयी गोपाल को फूलनदेवी की उपमा देने का माद्दा उनके अलावा किसी में नहीं। अपने एक ब्लॉग में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराना कोई हंसी-खेल नहीं। इस मुर्दा शहर में इतने जीवित व्यक्ति को अनोखा प्राणी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। कमी सिर्फ एक है। वो ये कि उनका जातिगत आधार नहीं, वरना अब तक तो एमएलए बन ही जाते।
शहर के जाने-माने बुद्धिजीवी होने के बावजूद लालू यादव की तरह मसखरापन उनका शगल है। उनकी त्वरित किस्सागोई के किस्से उनके मित्र चटखारे ले ले कर सुनाते हैं।
किसी जमाने में यूथ कांग्रेस के शहर अध्यक्ष थे। युवा तुर्क का वह दौर अब तक अध्यक्षों के लिए मिसाल है। प्रदेश कांग्रेस के सचिव रह चुके हैं। पिछले कुछ सालों से किसी खास पद पर नहीं, मगर अपने खास डील-डौल की तरह कद-काठी खुद के दम पर कायम कर रखी है। भीड़ में दूर से ही नजर आते हैं। किसी समारोह में आयोजक भूलवश नजरअंदाज भी कर दे, मगर खास मेहमान खुद ही उन्हें मंच पर बुला लेते हैं।
पिछले कुछ समय से ब्लॉगरों में भी शुमार हो गए हैं। लिखते ऐसे हैं, जैसे फ्री स्टाइल कुश्ती में आड़े-तिरछे दाव चले जाते हैं। हथोड़ा छाप। शब्दों के ट्विस्ट में भले ही वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र चतुर्वेदी का कोई सानी नहीं हो, मगर शब्दों के जरिए पत्थर पर रगडऩे के मामले में टंडन का कोई मुकाबला नहीं।
उनकी बेकाकी की मिसाल उनके एक ब्लॉग की ये पंक्तियां बयां कर रही हैं-
इस शहर के मुर्दे इस शहर में ही दफनाए जाएंगे, ये कफनखसोट अधिकारी और इनके चंगू-मंगू दलाल तो आते-जाते रहेंगे, मैं तो पैदा भी इसी अजमेर में ही हुआ हूं और अजमेर में ही कइयों का हिसाब करके मरूंगा। अजमेर शहर में अगर कुछ भी गलत, नाजायज, अवैध और तानाशाही एवं नादिरशाही होगी, वो न तो मेरी नजरों से बचेगी और न ही मैं जीतेजी होने दूंगा। चाहे किसी भी राजा का राज हो। मैंने सदा अजमेर के हित में आवाज उठाई है, जो पूरा अजमेर शहर जानता है।
भला ऐसा एक्स्ट्रा जीवित व्यक्ति चुप कैसे बैठ सकता है। लाइम लाइट में रहने के लिए कुछ न कुछ उठापटक करते रहते हैं। असल में उनकी दिमागदानी बहुत तेज है। उसी के दम पर फटे में टांग फंसाने का मौका तलाश लेते हैं। प्रशासन से कितनी बार पंगा मोल लिया है, उसकी गिनती करना कठिन है। खुद उन्हें ही याद नहीं होगा। दुस्साहसी भी कम नहीं। आखिरकार पंजाबी खून है। स्वर्गीय वीर कुमार जैसा। कुछ अरसे पहले कांग्रेस की एक बैठक में पानी के मुद्दे पर इतने उत्तेजित हो गए कि सरकार को चेताने के लिए विरोध स्वरूप बीसलपुर पाइप लाइन तोड़ देने का आव्हान कर डाला। मुकदमे दर्ज होने पर वकालत की व्यवस्था का भी जिम्मा ले लिया। मगर किसी का खून नहीं खौला। अजमेर वासियों की रगों में वैसे भी खून कम, पानी ज्यादा है। अजमेर को इलायची बाई का वरदान होने की कहावत यूं ही थोड़े बनी है।
हाल ही उन्होंने प्रशासन के पीछे पड़ का जवाहर लाल नेहरू अस्पताल का पुराना दरवाजा खुलवा लिया। मित्तल हॉस्पीटल के बाहर नाजायज पार्किंग का मुद्दा भी उठाया है। इसी प्रकार एलिवेटेड रोड की आगरा गेट से लेकर महावीर सर्किल तक की भुजा के मसले पर भी हाथ धो कर पीछ़ पड़े हैं। नगर निगम आयुक्त के घर पर स्वीमिंग पूल बनने का रहस्योद्घाटन भी उन्होंने किया।
उनकी ताजा दुंदुभी है, शहर के सारे ट्रांस्पोर्टरों को ट्रांसपोर्ट नगर में शिफ्ट करवाना। बाकायदा चेतावनी दी है कि अगर 25 अगस्त तक शिफ्ट नहीं करवाए गए तो वे अनिश्चिचित कालीन भूख हड़ताल पर बैठ जाएंगे। आपको याद होगा कि कई कलेक्टर आए और गए, मगर ट्रांसपोर्ट नगर शिफ्ट करवाने की घोषणाएं और निर्णय धरे के धरे रह गए। हो सकता है कि टंडन को पता लग गया हो कि मौजूदा कलेक्टर ने शिफ्ट करवाने की ठान रखी हो, इसी के मद्देनजर अनशन की चेतावनी दे दी हो, मगर ऐसी शिद्दत तो पहले के कई कलेक्टर भी दिखा चुके हैं, मौजूदा की क्या गारंटी है? जो कुछ भी हो, मगर अजमेर की बहबूदी के लिए टंडन की पहल की सराहना की ही जानी चाहिए। वाकई टायर्ड और रिटायर्ड अजमेर को ऐसे ही एक अन्ना हजारे की दरकार है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

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