क्यों नहीं हुआ फाल्गुन महोत्सव?

कई वर्षों से हर साल आयोजित होने वाला फाल्गुन महोत्सव इस बार क्यों नहीं हो पाया? आज हर एक की जुबान पर यह सवाल है, मगर जवाब किसी के पास नहीं है। हर जागरूक नागरिक, अधिकारी, व्यापारी, राजनीतिक नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार एक दूसरे से यह पता कर रहा है कि आखिर क्या वजह रही कि शहर का मात्र ऐसा शानदार कार्यक्रम, जो शहर की धड़कन था, जिसमें किसी न किसी रूप में सभी वर्गों की भागीदारी थी, जिसकी प्रसिद्धि अन्य शहरों तक फैल चुकी थी, वह बिना किसी चर्चा के गुपचुप ही विलुप्त कैसे हो गया?

तेजवानी गिरधर
असल में यह कार्यक्रम पत्रकारों की पहल पर होता रहा। इसमें राजनीतिक लोग, कलाकार सहित अन्य वर्गों के लोग सक्रिय सहभागिता निभाते थे। नगर निगम, अजमेर विकास प्राधिकरण, अजमेर डेयरी आदि प्रायोजक की भूमिका के लिए तत्पर रहते थे। आम लोग या तो दर्शक के रूप में मौजूद रह कर आनंद उठाते थे, या फिर अखबारों या फेसबुक पर फोटो व वीडियो युक्त कवरेज देख कर अपडेट हो जाते थे।
बेशक हर बार छोटे-मोटे मतभेद होते रहे, जो कि किसी भी समूह में स्वाभाविक भी है, मगर चूंकि आपस में मनमुटाव नहीं है, इस कारण यह दिलकश जलसा हर बार पहले से अधिक रोचकता लिए हुए आयोजित होता रहा। आम लोगों को पता नहीं, मगर इस आयोजन ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। हर बार कार्यक्रम की समीक्षा भी होती रही, ताकि गलतियों से सबक लिया जाए और आगे पहले से बेहतर व सुव्यवस्थित आयोजन हो। इस बार ऐसा क्या हुआ कि अनौपचारिक आयोजन समिति की एक भी औपचारिक या अनौपचारिक बैठक नहीं हुई? आपस में जरूर एक दूसरे से पूछते रहे, मगर सामूहिक चर्चा कहीं भी नहीं हो पाई। शहर की इस बेहतरीन सांस्कृतिक परंपरा का यूं यकायक नदारद हो जाना बहुत ही पीड़ा दायक है।
मुझे याद आता है आयोजन को लेकर हर बार होने वाली छोटी-मोटी परेशानी के मद्देनजर एक बार दैनिक भास्कर के स्थानीय संपादक डॉ. रमेश अग्रवाल ने दूरदर्शितापूर्ण प्रस्ताव रखा था कि फाल्गुन महोत्सव समिति का रजिस्ट्रेशन करवा लिया जाए, लेकिन कुछ सदस्यों ने इसका यह कह कर विरोध कर दिया कि इसकी जरूरत नहीं है। बिना विधिवत पंजीकृत संस्था के भी इतने साल से सफल आयोजन हो ही रहा है। उनका एक तर्क ये भी था कि इससे संस्था के भीतर राजनीति पैदा हो जाएगी, जिसमें थोड़ा दम भी था। हुआ ये कि जो सदस्य डॉ. अग्रवाल के सुझाव से सहमत थे, वे चुप ही बैठे रहे, उन्होंने कोई दबाव नहीं बनाया, नतीजतन प्रस्ताव आया-गया हो गया। काश, संस्था का रजिस्ट्रेशन हो जाता तो आज जो नौबत आई है, वह नहीं आती। संस्था के किन्हीं एक-दो पदाधिकारियों की रुचि न भी होती तो भी अन्य सदस्य एकजुट हो कर कार्यक्रम की अनिवार्यता के लिए माहौल बना सकते थे। कम से कम निर्वाचित कार्यकारिणी पर तो जिम्मेदारी होती ही, मगर आज स्थिति ये है कि आयोजन न होने को लेकर न तो कोई जिम्मेदार है और न ही कोई जवाबदेह। आयोजन से जुड़े हर सदस्य ने आपसी चर्चा में कार्यक्रम किसी भी सूरत में करने की बात तो कही, मगर पहल किसी ने नहीं की। इसी अराजक स्थिति का परिणाम ये है कि शहर उल्लास के सामूहिक उत्सव से वंचित रह गया।
चूंकि आयोजन करने वालों में पहली पंक्ति में पत्रकार साथी हुआ करते हैं, इस कारण चाहे अनचाहे ये संदेश जा रहा है कि उनमें कोई मतभेद रहे होंगे, जबकि ऐसा है नहीं। सभी पत्रकार साथियों की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे शहर की सांस्कृतिक धारा को अनवरत बहने का मार्ग प्रशस्त करें।
उम्मीद है कि समिति, जिसे फिलहाल समूह कहना ज्यादा उपयुक्त रहेगा, के बेताज कर्ताधर्ता गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे, ताकि अगले साल वर्षों पुरानी परंपरा को फिर से जीवित किया जा सके।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

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