आज लौटी छतों की रौनक

देश ने चिकित्सकों का किया अभिनंदन
*देश ने एक साथ बजाई प्रकृति की धुन*

अमित टण्डन
अजमेर। आज सच में मज़ा आ गया। छतों पर ऐसी रौनक करीब 25 साल बाद देखी। एक जमाना था जब छतों पर हर घर से पतंगें उड़तीं थीं, गर्मियों में रातें छतों पर रौनकें लाती थीं, क्योंकि लोग छतों पर सोते थे, तो देर तक एक दूसरे से आमने-सामने छतों पर बातें करते थे और गप्पें लड़ाते थे ।
पिछले करीब 25 वर्षों से डिश एंटीनो (tv प्रोग्राम) या फोन और सोशल साइट्स पर घुसी आदम की औलादें प्रकृति को भूलकर सृष्टि को बर्बाद करने पर तुली थीं।
*कोरोना ने आईना दिखा दिया।*
छतों पर थाली बजाने या ताली बजाने से वायरस मरेंगे या नहीं, जिसे बहस करनी है, करता रहे। वैज्ञानिक प्रमाणिकता, आध्यात्मिक मान्यता के आधार पर इस *इवेंट* पर पक्ष-विपक्ष वाले भिड़ते रहें; *मगर आज फ़िज़ाओं में जो एक धुन थी वो इंसान होने का एहसास करा रही थी। छत पर खड़े होकर जो थाप सुनी वो प्रकृति के गर्भ से निकला कोई संगीत था या आसमान से उतरी कोई रचना। जो भी था, मगर था बहुत मधुर।*
इसके उद्देश्य भी अलग अलग देख कर लोग चर्चा या बहस कर सकते हैं। मगर एक बात स्पष्ट है कि इसका कोरोना वायरस से कोई लेना देना हो या न हो, मगर प्रधानमंत्री ने इस आयोजन का आह्वान इसलिए किया था कि हम आम तौर पर जिन चिकित्सकों को मनी माइंडेड कह कर, कभी लापरवाह कह कर, कभी ज़िम्मेदारियों के प्रति निष्ठुर कह कर प्रताड़ना या आलोचना देते रहते हैं, आज वही चिकित्सक बिरादरी अकेली ऐसी है जो घर से बाहर रह कर अकेले काम कर रही है।
आज जब समस्त मानव जाति घरों में क़ैद है, जब लोग अपनों तक से दूरी बनाए छूत-अछूत जैसा व्यवहार कर रहे हैं, ऐसे में चिकित्सक व चिकित्सा कर्मचारी हैं जो अस्पतालों में संक्रमण के बीच बैठ कर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। करोना से युद्ध में हर आमो-खास स्वयं को बचाने में लगा है, और चिकित्सक समुदाय परहित में काम कर रहा है।
अब ये जनता का फ़र्ज़ है कि ऐसी विषम परिस्थिति में कोरोना जैसे आक्रमणकारी शत्रु से लड़ने वाले योद्धाओं का अभिनंदन करे।
आज का 5 मिनट का ये *स्वरनाद* बस उसी अभिनंदन और धन्यवाद ज्ञापन के लिए था।
कोई थाली बजा रहा था, कोई मंजीरे, तो कोई घन्टी, तो कोई तालियां व अन्य बर्तन बजा कर इस संगीत में अपनी संगत दे रहा था। लोगों ने पटाखे फोड़ कर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। भारत की जनता ने ये तो साबित कर दिया कि देश के लोग भय को भगाने के लिए उत्सव मना लेते हैं, यानी हौसला हो तो दहशत को जश्न में बदलना हमें आता है। *इसमें वैज्ञानिक आधार मत ढूंढो*
मैं जानता हूँ कि इस आयोजन को राजनीतिक नज़र से देखने वाले जरूर इसकी आलोचना कर मखौल उड़ाएंगे, मगर ये विषय मज़ाक उड़ाने का नहीं है। संजीदगी से सोच कर मंथन करने का है।
*–अमित टंडन, अजमेर*

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