*जिला पर्यावरण समिति कहां खो गई?*

-आनासागर की बर्बादी के जिम्मेदारों के खिलाफ अभी तक क्यों हुई कार्यवाही
-क्या जिम्मेदार अधिकारी बता सकते हैं, पर्यावरण समिति की बैठक कितने वर्षों से और क्यों नहीं हुई?
-क्या आनासागर की बर्बादी होने के बाद भी पर्यावरण समिति की बैठक बुलाने की याद नहीं आई?
-अभी तक शहर के प्रबुद्ध लोगों, पर्यावरण विशेषज्ञों से चर्चा क्यों नहीं की गई?
-क्या अजमेर के हित से जुड़े फैसले अधिकारियों की मनमर्जी से होने चाहिए या जनता की भागीदारी होनी चाहिए?

✍️प्रेम आनन्दकर, अजमेर।
👉आनासागर की बर्बादी की इबारत लिखने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी समय जिला स्तरीय पर्यावरण समिति होती थी, जिसमें पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ-साथ प्रबुद्ध नागरिक और कुछ अधिकारी शामिल होते थे। समिति के मुखिया जिला कलेक्टर होते थे। जहां तक जानकारी है, पिछले कई वर्षों से पर्यावरण की बैठक ही नहीं हुई है। यदि बैठक होने की जानकारी किसी के पास हो तो ज्ञानवर्द्धन कीजिए। इस समिति में जो पर्यावरण विशेषज्ञ और शिक्षाविद बतौर सदस्य शामिल थे, वे मुझे मिल गए। उन्होंने बातचीत में आनासागर की बर्बादी को लेकर लिखे गए ब्लॉग पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जिला प्रशासन से यह सवाल पूछने का आग्रह किया कि पर्यावरण समिति की बैठक कितने समय से नहीं हुई है। क्या आज भी पर्यावरण समिति वजूद में है या नहीं? यदि है, तो कब-कब बैठक हुई और बैठक में किन-किन मुद्दों पर चर्चा करते हुए क्या-क्या निर्णय किए गए? अब इन सवालों को लेकर यदि सूचना का अधिकार के तहत आवेदन किया जाए, तो अपनी खाल बचाने के मकसद से यही जवाब दिया जाएगा कि फलां क्रम संख्या प्रश्नात्मक है।

प्रेम आनंदकर
अब कोई यह पूछे कि क्या, क्यों, कैसे, कब, कहां जैसे सवालिया लहजे में ही बातचीत की जाती है, तो फिर ऐसे आवेदनों को प्रश्नात्मक बताकर टाल क्यों दिया जाता है। इसलिए इस ब्लॉग के माध्यम से जिला प्रशासन से इन सवालों के जवाब अपेक्षित हैं। अब एक सवाल और सामने आता है कि आनासागर की दुर्दशा को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में जो गलत बयान दिए गए, झूठी कहानी सुनाई गई, उसके लिए कौन जिम्मेदार हैं। एनजीटी में जो मामला चल रहा है और जिसे लेकर एनजीटी ने फैसला सुनाया है, क्या उसके बारे में जिला स्तरीय पर्यावरण समिति की कोई बैठक बुलाई गई? क्या समिति के सदस्यों से एनजीटी में दिए गए हलफनामे के बारे में पूछा गया? इन सभी सवालों के जवाब हां में हैं, तो जिला प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करते हुए जनता को अवगत कराना चाहिए और यदि ना में है, तो फिर अपने झूठ पर पर्दा डालने की बजाय जनता से माफी मांगनी चाहिए।
’’आनासागर की बर्बादी के जिम्मेदारों कुछ तो शर्म करो’’, इस शीर्षक से 7 मई को लिखे गए मेरे ब्लॉग पर कुछ लोगों ने जो प्रतिक्रिया दी है, वह हूबहू आपकी नजर है।
*एक सज्जन ने बहुत ही अच्छा सुझाव दिया है-*
👉अजमेर के ही कोटड़ा निवासी पर्यावरणविद् और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय में कार्यरत डॉ. आलोक पांडे से भी इस विषय में संपर्क किया जा सकता है, जो केंद्र से समस्या के समाधान के लिए विशेषज्ञ और संसाधन भी उपलब्ध करा सकते हैं। आप सभी को जानकारी दे दूं कि डॉ. आलोक पांडे नमामि गंगे प्रोजेक्ट और नदी जोड़ो प्रोजेक्ट पर भी कार्य कर रहे हैं।
*एक अन्य सज्जन ने कहा-*
👉जलकुंभी खत्म होगी, तो कई नेताओं, अफसरों और ठेकेदारों की कमाई जाती रहेगी। उनकी ऊंचे लोग ऊंची सोच रहती है।
*एक बात और*
👉दोस्तों मैंने ब्लॉग में यह भी बताया कि अजमेर में अनेक ऐसे शिक्षाविद् हैं, जो सीधे तौर पर पर्यावरण संबंधी मामलों के विशेषज्ञ हैं। लेकिन एक बार भी किसी अधिकारी ने उनसे संपर्क नहीं किया। यही नहीं, अजमेर के ही महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय का पर्यावरण अध्ययन विभाग आनासागर झील के पानी पर रिसर्च करवा चुका है। कुछ विद्यार्थी तो आनासागर पर पी.एचडी. भी कर चुके हैं। जिले के मालिक होने का तमगा पहने अधिकारियों यदि जरा इन लोगों से भी मशविरा कर लिया होता, तो शायद जलकुंभी इतना विकराल रूप नहीं लेती और उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े नहीं होतेl

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