*हमारे देश की प्रशासनिक सिस्टम गजब का है। यहां उद्घाटन से पहले अरबों रूपए खर्च करके नदियों पर बनाए पुल गिर जाते हैं। करोड़ों रुपए की लागत से बनी नई सड़कें पहली ही बरसात में बह जाती है। हर साल लाखों खर्च करके शहर-शहर में साफ कराए जाने वाले नाले दो-तीन तेज बरसात में ओवरफ्लो होकर सड़कों पर आ जाते हैं। बरसात का पानी नालों की बजाय सड़कों पर बहता है। जहां खुदाई करके पाइप लाइन डाली जाती है,वही सड़क बनने के थोड़े दिन बाद बिजली या टेलीफोन की केबल डालने के लिए सड़क को फिर खोद दिया जाता है। करोड़ों रुपए खर्च करके बनने वाली सरकारी इमारतें कुछ ही सालों में खंडहर लगने लगती है। उनकी छतें टपकने और दीवारें झड़ने लगती है। रेलवे स्टेशन पर मासूम बच्ची के साथ हैवानियत होने के बाद पता चलता है कि वहां लगे अधिकांश सीसीटीवी कैमरे खराब थे। जानलेवा रेल हादसों के बाद पता लगता है कि ट्रेन को उस ट्रैक पर जाने का सिग्नल दे दिया गया था,जहां आगे दूसरी ट्रेन खड़ी थी।* ओम माथुर*आखिर लगातार होने वाली ऐसी घटनाओं पर रोक क्यों नहीं लगती है? क्यों बार-बार इस तरह की घटनाएं है होती है? क्यों जिम्मेदार आंखें मूंदकर बैठे रहते हैं? इसका मुख्य कारण ये है कि प्रशासनिक अमले यानि अधिकारियों,इंजीनियरों,पुलिसवालों,कर्मचारियों आदि के खिलाफ सख्त कार्यवाही नहीं होती। सरकारी नौकरियों में एपीओ,तबादला-निलंबन जैसी सामान्य कार्यवाई कोई मायने नहीं रखती। हो सीधघ बर्खास्तगी। फिर इन्हें बचाने के लिए एक राजनीतिक तंत्र भी सक्रिय रहता है। जिसे अफसरशाही अर्थतंत्र का ऑक्सीजन देकर हमेशा अपने आसपास रक्षा कवच के रूप में बनाए रखती है। ताकि जरूरत पड़ने पर वह इनकी रक्षा कर सके। यानी राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़ घटनाओं का बड़ा कारण है। ये गठजोड़ मिलकर न्यायिक प्रक्रिया को भी गुमराह करने से नहीं चूकता। अगर पुल या सड़क टूटते ही ठेकेदार के साथ ही इन ठेकों के साथ जुड़े इंजीनियरों और अफसर को भी गिरफ्तार कर लिया जाए और कानूनी कार्यवाही के साथ ही इन पर पुल की लागत की वसूली का दंड भी लगाया जाए। यानि ठेकेदार और इंजीनियरो़ं से पूरी वसूली हो। तो हो सकता है देश में मजबूत पुल और सड़के बनने लगे हैं। आखिर देश की जनता के टैक्स के पैसों का नुकसान करने का अधिकारियों को किसने दिया? पूरे शहर में अपराध रोकने के लिए सीसीटीवी कैमरे लगवा दिए। लेकिन जब अपराध हो गया और अपराधी की पहचान के लिए फुटेज देखने लगे, तो पता चला कि अधिकांश कैमरे बंद पड़े हैं। ऐसा होने पर क्यों नहीं शहर के एसपी के खिलाफ ही कार्यवाही की जाए। जब बड़े अफसर नपेंगे,तभी तो छोटे सुधरेंगे। अपने अजमेर के स्टेशन को ही देख लीजिए। 4 दिन पहले 12 साल की बच्ची से पूरी दरिंदगी के बाद जब आरोपी की तलाश के लिए सीसीटीवी कैमरे देखे गए,तो मालूम पड़ा 56 में से 27 कैमरे बंद पड़े हैं और उसमें उस प्लेटफॉर्म के कैमरे भी शामिल हैं, जहां वारदात को अंजाम दिया गया। आखिर यह कमरे एक दिन में तो खराब हुए नहीं होंगे, इसका मतलब यह हुआ कि सब कुछ भगवान भरोसे था। अगर यह वारदात नहीं होती तो हो सकता है धीरे-धीरे सभी कैमरे सिर्फ शो पीस बनकर रह जाते हैं? लेकिन हुआ क्या,कुछ भी नहीं। जबकि जीआरपी या आरपीएफ जिसके भी जिम्मे कैमरे थे,उसके पूरे स्टाफ पर सख्त कार्यवाही होती।*
*कभी शहर की शान कई जाने वाली और अब गंदे पानी की तलैया बन गई आनासागर झील का मामला भी देख लीजिए। नगर निगम ने एनजीटी में यह झूठ बोलने से भी गुरेज नहीं किया कि आनासागर में गंदे पानी का कोई नाला नहीं गिर रहा है। यह भी बताया कि 11 नालों को डाइवर्ट कर एसटीपी से जोड़ दिया गया है और दो का पानी एसटीपी के जरिए ट्रीट होकर झील में डाला जा रहा है। जबकि हकीकत ये है कि नालों के जरिए आज भी झील में पानी जा रहा है। ऐसे में एनजीटी ने आनासागर में गिर रहे 21 नालों पर प्रति नाल रोजाना ₹25 हजार की पेनल्टी लगाई है। यह लाखों रुपए निगम के खजाने से जाएंगे। जबकि होना ये चाहिए कि निगम का चुना हुआ बोर्ड खुद साधारण सभा में प्रस्ताव लाकर इस पैसे की वसूली जिम्मेदार निगम के अधिकारियों से करें। इसीक्षगंदे पानी की वजह से झील में जलकुंभी हुई, जिसे निकालने में निगम अब तक करीब 7 करोड रुपए खर्च कर चुका है। यह तय है कि जब तक प्रशासनिक सिस्टम को कसा नहीं जाएगा और नेता अधिकारियों को प्रश्रय देना बंद नहीं करेंगे,हर वो हादसा होता रहेगा, जो नहीं होना चाहिए।*