अजमेर नगर निगम की नवनिर्वाचित महापौर अनामिका शर्मा जिस ऊर्जा और सक्रियता के साथ अपनी नई जिम्मेदारी संभालती दिखाई दे रही हैं, उससे शहर को उनसे कुछ नया और बेहतर करने की उम्मीद बंधना स्वाभाविक है। पदभार संभालने के बाद ही उनका सफाई व्यवस्था का जायजा लेने निकल पड़ना भी इसी सक्रिय तेवर का संकेत माना जा सकता है। लेकिन नगर निगम की चुनौतियां केवल सड़कों, नालियों, सफाई और विकास कार्यों तक सीमित नहीं हैं। निगम की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर उठते सवाल भी नई महापौर के सामने बड़ी चुनौती होंगे। इन्हीं सवालों में एक है ‘लिफाफा संस्कृति’ का आरोप। नगर निगम की एक बैठक में एक पार्षद द्वारा कथित रूप से इस तरह की व्यवस्था पर खुलकर सवाल उठाए जाने की चर्चा होती रही है। इसके अलावा आम धारणा के रूप में यह आरोप भी लगाया जाता रहा है कि सफाई जैसे ठेकों के निर्धारित बजट में से किसी न किसी रूप में हिस्सा पार्षदों तक पहुंचता है। हालांकि ऐसे आरोपों को प्रमाणित तथ्य मानने से पहले उनके ठोस प्रमाण और आधिकारिक जांच का होना जरूरी है। फिर भी सवाल अपनी जगह गंभीर है।
यदि नई महापौर वास्तव में निगम की कार्यशैली में पारदर्शिता और नई संस्कृति स्थापित करना चाहती हैं, तो उन्हें केवल विकास कार्यों की गति बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना होगा। उन्हें यह संदेश भी देना होगा कि निगम के ठेके, भुगतान, कार्यादेश और गुणवत्ता की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी और किसी भी जनप्रतिनिधि की भूमिका नियमों से बाहर नहीं होगी। यही वह मोर्चा होगा जहां अनामिका शर्मा की असली परीक्षा होगी।
क्या वे ठेकों की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बना पाएंगी? क्या सफाई व्यवस्था में भुगतान और काम की गुणवत्ता का सार्वजनिक हिसाब सामने आ सकेगा? क्या पार्षदों और ठेकेदारों के बीच किसी भी प्रकार के आर्थिक लेन-देन की गुंजाइश पर प्रभावी अंकुश लगेगा? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या वे स्वयं ऐसी किसी व्यवस्था से दूरी बनाए रखते हुए निगम में ‘काम के बदले कमीशन नहीं, काम के बदले जवाबदेही’ की संस्कृति स्थापित कर पाएंगी?
अनामिका शर्मा ने पदभार ग्रहण करते समय जनसमस्याओं के त्वरित समाधान और शहर की मूलभूत सुविधाओं को प्राथमिकता देने की बात कही है। अब शहर यह देखना चाहेगा कि उनकी ऊर्जा और सक्रियता व्यवस्था की पारदर्शिता तक भी पहुंचती है या नहीं। क्योंकि अजमेर को केवल साफ सड़कें और बेहतर सफाई व्यवस्था ही नहीं चाहिए, उसे ऐसी निगम व्यवस्था भी चाहिए जिस पर भरोसा किया जा सके। और शायद यही अनामिका शर्मा के कार्यकाल की सबसे बड़ी कसौटी होगी।