महाराष्ट्र में क्यों लड़ रही है भाजपा और शिवसेना

एस.पी.मित्तल
एस.पी.मित्तल

एक कहावत है,’भाई मरने का गम नहीं, पर भाभी की अकड़ निकल गईÓ कुछ ऐसा ही इन दिनों महाराष्ट्र में हो रहा है। राजनीति में भाजपा और शिवसेना को भाई-भाई माना जाता रहा है, लेकिन अब बड़े भाई भाजपा का लगातार यह प्रयास है कि किसी भी तरह शिवसेना की अकड़ निकाल दी जाए। हो सकता है कि भाजपा इस मंसूबे में सफल भी हो जाए, लेकिन सवाल उठता है कि क्या भाई की हत्या कर देने से राजनीतिक मकसद पूरा हो जाएगा? पूरे देश में महाराष्ट्र एक ऐसा प्रांत है, जहां भाजपा की विचार धारा के अनुरूप शिवसेना जैसी पार्टी है। हम घर परिवार में भी देखते हैं कि छोटा भाई कई बार घर की नीतियों के खिलाफ काम करता है। यहां तक कि छोटे भाई के कृत्य से बड़ा भाई और परिवार का मुखिया बेहद नाराज होते हैं, लेकिन फिर भी छोटे भाई को परिवार से अलग नहीं किया जाता, क्योंकि यदि छोटे भाई को अलग किया गया तो बाहर उन लोगों को फायदा होगा, जो भाई-भाई में झगड़ा होने पर अपना लाभ देख रहे हैं। महाराष्ट्र में भाजपा की भूमिका बड़े भाई और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संध की भूमिका परिवार की मुखिया की है। पिछले दिनों हमने देखा कि जब केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के पद पर अपनी लार टपकाई तो संघ प्रमुख मोहन भागवत ने गडकरी को नागपुर स्थित मुख्यालय पर बुलाया और गडकरी की जीब को अंदर घुसेड़कर मुंह पर टेप चिपका दिया। योजना के मुताबिक फडऩवीस ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। यहां सवाल उठता है कि जब भाजपा और शिवसेना ने आपसी विवाद हो रहा है, तो संघ क्यों नहीं दखल करता? विधानसभा चुनाव में भजपा ने अपने कद को और बढ़ा लिया है तथा विधानसभा में शिवसेना के बगैर भी विश्वास मत हासिल कर लिया जाएगा, लेकिन शिवसेना के बगैर विश्वासमत हासिल करना भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए सम्मान की बात होगी। शिवसेना का तो अडिय़ल रवैया शुरू से ही है। लेकिन भाजपा को यह समझना चाहिए कि मुम्बई में जो हालात है, उसमें शिवसेना की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। अच्छा हो कि संघ और भाजपा अभी भी ऐसा कोई रास्ता निकाल ले, जिससे शिवसेना के साथ मधुर संबंध बने रहे। सुरेश प्रभु  को तो केन्द्रीय मंत्री बनाने जैसे तरीकों से शिवसेना को कमजोर नहीं किया जाए। भाजपा यह अच्छी तरह समझ ले कि यदि महाराष्ट्र में शिवसेना कमजोर होती है, तो आगे चलकर भाजपा को ही बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह माना कि नरेन्द्र मोदी बहुत ही स्वाभीमानी व्यक्ति है। शिवसेना के उद्धव ठाकरे ने चुनाव के दौरान मोदी पर जो गंभीर टिप्पणी की उसमें मोदी आहत है, लेकिन जब नरेन्द्र मोदी देश के सवा सौ करोड़ लोगों को साथ लेकर चलने की बात करते हैं, तो क्या शिवसेना को सथ लेकर नहीं चल सकते। सवा सौ करोड़ में वे लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने कश्मीर में खूंखार आतंकवादी संगठन आईएस के झंडे लहराए और वे लोग भी शामिल है जो हर कीमत पर इस देश का विभाजन चाहते हैं। मोदी देश का विभाजन चाहने वालों को तो साथ लेकर चलने का प्रयास कर रहे हैं और जो शिवसेना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचार धारा के अनुरूप है, उसे बार-बार कमजोर कर रहे है। आने वाले दिनों में झारखंड, जम्मूकश्मीर और दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने हैं, इन चुनावों में भाजपा को कड़ी चुनौती मिलने वाली है। इन सब स्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही ऐसा फार्मूला लागू करना चाहिए, जिससे शिवसेना के साथ दोस्ती बनी रहे।
-(एस.पी.मित्तल)

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