धंधा हो मंदा तो मांगो भीख या चंदा

sohanpal singh
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हमारे एक मित्र हैं मुंशी जी यानि मुंशी इतवारी लाल, वो हमे बता रहे थे धंधा जब भी मंदा हों तो मांगो भीख या चन्दा, यानि ये भी धंधा ही है , जब कभी बिज़नेस न चल रहा हो किसी भी मंदिर मस्जिद के नाम पर भीख मांगो खूब मिलेगी कुछ पैसा उसमे लगाओ बाकी अपनी जेब में ? इसी प्रकार से किसी सामाजिक संस्था को बनाओ और समाज की भलाई में लग जाओ, गाय पलो या गाय पलकों को पालो सब चलता है ? उनका तो यह कहना है की जन सेवा के नाम पर ही कई व्यापारियों का धंधा खूब चल रहा है ? राजनीती में भी ऐसा ही चलता है , अभी पिछले दिनों एक दिग्गज राजनीतिज्ञ ने जब मांगने का धंधा शुरू किया तो क्या क्या न मांग लिया उसने तो एक पूर्व उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्री की मूर्ति बनाने के लिए देश भर के किसानो से पुराना टूटा फूटा हल हासिये तसले फावड़े खेती के काम आने वाले औजारों को एकत्र किया लाखों टन लोहा एकत्र हुआ लेकिन राजनीतिज्ञ भी हिट हो कर फिट गया और मूर्ति न बननी थी न बनाने के ही कोई आसार हैं । अब होगा क्या कुछ नहीं क्योंकि इस देश की जनता बिना रीढ़ के केंचुये ही है जो मिट्टी खाते हैं और मिट्टी ही हगते है जो खेतों उर्वरक बनाती है । राजनीति के खिलाडियों को और क्या चाहिए , इसी कड़ी में आज सरकार ने ऐलान किया है कि उसने भारतीय सेना के लिए एक अकाउंट सिंडिकेट बैंक की दिल्ली स्थित शाखा में खोला है जिसमे कोई भी व्यक्ति एक रूपये से लेकर चाहे जितना पैसा जमा करा सकता है , इस पैसे से जो एक रूपये से ही 100 से 130 करोड़ रुपया एक दिन में ही जमा हो सकता है जिससे भारतीय सेना को मजबूत करने में भारत सरकार को सहायता मिलेगी । ये मांगने के प्रवृति किसी साधू स्वाभाव के व्यक्ति से तो उचित लगती है लेकिन अगर कोई व्यक्ति जो अपने डिज़ाइनर कपड़ो पर ही 72 करोड़ रुपया खर्च कर चूका हो उसके मांगने पर शर्म आती है ? लेकिन ये जादूगर अपना अंतिम जादू दिखाने तक चुप होकर बैठने वाला नहीं , सरदार पटेल की मूर्ति बने या न बने लेकिन अगर इस मांगने की क्रिया से भारतीय फ़ौज ताकतवर बनती है तो जादूगर को बधाई ?

एस पी सिंह, मेरठ ।

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