राजनीतिक गिरगिट

प्रेम आनंदकर
मैं राजनीति से जुड़ी अपनी पिछली कुछ पोस्ट में यह कह चुका हूं कि राजनीति अब बहुत घटिया स्तर की होने लगी है। इसके हजार रंग हो गए हैं। राजनेता गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं। अब तो शायद रंग बदलने में राजनेताओं के आगे गिरगिट भी शरमाने लगी होगी। जहां पहले राजनीति केवल जनता की सेवा के लिए होती थी, वहीं अब जनता के हितों की कीमत पर राजनेता अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए करते हैं। राजपा के अध्यक्ष किरोड़ी लाल मीणा किसी वक्त भाजपा और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को पानी पी-पीकर कोसा करते थे, आज राज्यसभा में जाने के लिए भाजपा और श्रीमती राजे की गोद में बैठ गए हैं। किसी समय तीसरा मोर्चा (थर्ड फ्रंट) बनाने के लिए गला फाड़-फाड़ कर राग अलापते थे, आज स्वार्थों के वशीभूत होकर माफी मांगने में भी गुरेज नहीं किया। वैसे व्यवहार में माफी मांगना बहुत अच्छी बात है, लेकिन सवाल यह उठता है कि माफी किस बात के लिए मांगी। क्या भाजपा व श्रीमती राजे को कोसने के माफी मांगी या फिर अपने को उपकृत के लिए माफी मांगने की आड़ में आभार जताया। अब भले ही यदि सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते। यह अच्छी बात भी है, किंतु सुबह से शाम तक कोसने के बाद घर लौट आने को क्या कहा जाए। यदि इसी साल नवम्बर-दिसम्बर में होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनाव को देखें, तो भाजपा और श्रीमती राजे पिछले पांच साल से हाशिये पर रहे नेताओं की फिर से पार्टी में वापसी के लिए जतन कर रहे हैं, ताकि वोटों के बिखराव को रोका जा सके। इनमें कद्दावर नेता पूर्व शिक्षा मंत्री जयपुर के सांगानेर से विधायक घनश्याम तिवाड़ी और हनुमान बेनीवाल भी शामिल हैं। फिर वही सवाल वापस सामने आता है कि जब तीखे तेवर अपनाने वाले पार्टी नेताओं को पार्टी की मुख्य धारा में ही लाना है तो पांच साल तक इनसे दूरी क्यों रखी गई। क्यों तिवाड़ी की यात्राओं को रोका गया। क्यों बेनीवाल पर हमेशा निशाना साधे रखा गया। तिवाड़ी और बेनीवाल भाजपा में शामिल होंगे या नहीं, यह तो आने वाला समय बताएगा, किंतु सवाल अपनी जगह कायम रहेंगे। हो सकता है, मीणा की तरह इन दोनों नेताओं को भी राजनीतिक प्रलोभन दिया जाए। अब यह भी देखना होगा कि अपने भाषणों में हमेशा सत्ता-संगठन नेतृत्व पर निशाना साधने वाले यह नेता भी जनता के हितों की कीमत पर समझौता करते हैं या नहीं, क्योंकि इन दोनों नेताओं की जनता पर अच्छी पकड़ है और जनता भी उनकी बेबाकी की कायल है।

-प्रेम आनन्दकर, अजमेर, राजस्थान।

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