दलितों को गुमराह कर रही ये सरकार

ऽ बाबूलाल नागा ऽ
क्या हम अपने देश के कानूनों को बहुत गंभीरता से नहीं लेते हैं। क्योंकि जिस जल्दबाजी के साथ हम कानूनों में संशोधन कर लेते हैं उससे तो यहीं झलकता है। हाल में सुप्रीम कोर्ट की ओर से अनुसूचित जाति व जनजाति (एससी/एसटी एक्ट) में जो संशोधन किए गए हैं वो इसी बात को साबित करता है। हालांकि हम न्यायालय के इस निर्णय का सम्मान भी करते हैं पर दिए गए इस निर्णय में इस कानून की धार व मूल भावना को ही निरस्त कर प्रभावहीन बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक अब अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति एक्ट के तहत सरकारी कर्मचारियों की तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी। अदालत ने मामले की जांच पहले डिप्टी सुपरिटेंडेंट रैंक के किसी अफसर से करवाने का आदेश दिया है। फैसले में इसे आधार माना गया था कि अधिकतर मामले फर्जी होते हैं और एक्ट का सहारा लेकर फंसाया जाता है।

बाबूलाल नागा
उल्लेखनीय है कि देश में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के वर्गों पर होने वाले वीभत्स व अमानवीय अत्याचारों पर रोक लगाने और इन वर्गों की सुरक्षा प्रदान करने के लिए वर्ष 1989 में भारतीय संसद ने अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989, कानून पारित किया था। इसी कानून में जनवरी 2015 में संशोधन कर उसे और अधिक कठोर बनाया गया। यह कानून इस आशय से बनाया गया था कि हजारों वर्षों से सताये जा रहे इन वर्गों को राहत मिले पर सुप्रीम कोर्ट के नए प्रावधानों के बाद अपराधियों में कानून का भय नहीं रहेगा और दलितों पर अत्याचार बढ़ने की आशंका बनी रहेगी। अब एससी/एसटी एक्ट लगने के बाद भी बगैर जांच के गिरफ्तारी पर रोक लगाई गई है जिससे मुश्किलें बढें़गी।
आज इस कानून में संशोधन तब हुआ जब देश में दलित अत्याचार की घटनाएं चरम पर है। आज देश का दलित समुदाय डर व भय के माहौन में जी रहा है। जल्दबाजी में किए गए इन संशोधनों के कई दुष्परिणाम निकल सकते हैं। इससे दलित वर्ग के लिए कठिनाइयां और बढ़ने की आशंका है। दलित समुदाय जातिवाद से मुक्त होना चाह रहा है तो उन पर अत्याचार व हमले हो रहे हंै। पहले दलित समुदाय के लोेग अत्याचार का विरोध करने व जवाब देने में संकोच करते थे लेकिन अब वो अत्याचार का विरोध करने लगे हैं और जवाब भी दे रहे हंै। पहले लोग दलितों के प्रति सहानुभूति पूर्वक रवैया अपनाते थे परंतु अब उनके प्रति सर्वण समाज ने इष्यालु रवैया अपना लिया है। अब वे आरक्षण व इस अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को खत्म करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हंै। दलितों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों और मीडिया द्वारा ऐसे मामलों में सक्रियता दिखाने के बावजूद दलितों के खिलाफ अपराध की घटनाएं अभी भी सुर्खियों में है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकडों अनुसार पिछले दस साल (वर्ष 2007 से 2017) तक दलित उत्पीड़न के मामलों में 66 प्रतिशत को बढ़ोतरी हुई है। इसी दौरान में रोजाना देश में 6 दलित महिलाओं के यौन शोषण व अत्याचार के मामले दर्ज किए गए हंै जो 2007 की तुलना में अब दुगने हो गए हैं। वर्ष 2006 में दलितों के खिलाफ अपराधों के कुल 27070 मामले दर्ज किए गए जो 2011 में बढ़कर 33719 हो गए। वर्ष 2014 में अनुसूचित जाति के वर्गों के साथ अपराधों के 40401 मामले, 2015 में 38670 मामले और 2016 में 40801 मामले दर्ज किए गए। आंकडों के मुताबिक 10 वर्षों में दलित महिलाओं के साथ दुष्कर्म के माममों में दुगनी वृिद्व हुई है। 2006 में जहां प्रत्येक दिन दुष्कर्म के यहां 3 मामले दर्ज होते थे वर्ष 2016 में बढ़कर 6 हो गए हैं। आंकडे यह भी सिद्व करते हैं कि अनुसूचित जाति/जनजाति की अत्याचार के मामलों में पुलिस द्वारा दबे कुचले और मूक पीडितों की प्रथम सूचना रिपोर्ट ही नहीं लिखी जाती है। यदि किसी तरह प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखी भी गईहै तो जांच के दौरान उन में 60 प्रतिशत शिकायतों को जातिगत द्वैषता से प्रेरित होकर झूठा करार दिया जाता है, जिसके कारण बहुसंख्यक दलित उत्पीड़न के लोग न्याय व सुरक्षा से वंचित हो जाते हैं। दबंग अत्याचार करने वाले लोग दलित, गरीब पीड़ितों पर अत्याचार कर दलितों की मानवीय गरिमा के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं।
पहले ही दलित उत्पीड़ित के दस में से दो केस ही पंजीकृत होते थे अब सुप्रीम कोर्ट ने उसे और भी जटिल कर दिया है। कुछ लोगों का कहना है कि एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग होता है पर हमें यह भी देखना होगा कि दलित उत्पीड़न के 70 से 80 प्रतिशत केस तो दर्ज ही नहीं होते हैं। देश में दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता। न्याय नहीं मिलने के कई कारण हैं। पुलिस द्वारा मुकदमें दर्ज नहीं किए जाते। अगर किए भी जाते हैं तो सही धाराओं व एससी/एसटी के अंतर्गत दर्ज नहीं कर केस को कमजोर कर दिया जाता है। जांच अधिकारियों द्वारा निष्पक्ष जांच नहीं की जाती। जांच करने में देरी की जाती है। आरोपी को तुरंत गिरफ्तार नहीं किया जाता है। यही कारण है कि आज अनुसूचित जाति/जनजाति समुदाय पर अत्याचार करने वाले दबंग लोगों को सजा मिलने का प्रतिशत बहुत थोड़ा है जिसके कारण से देश के वंचित वर्गों, महिलाओं व गरीबों में सामाजिक असंतोष पैदा होता जा रहा है जो कि देश की कानून व्यवस्था सामाजिक सद्भाव के लिए घातक सिद्व हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लेकर दलित समाज में आक्रोश है और कई राज्यों में इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया जा रहा है। राजस्थान दलित अधिकार अभियान ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए इस फैसले को लेकर सरकार व राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, जनजाति आयोग से इस फैसले में तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है। एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि उच्चतम न्यायालय के फैसले में इस अधिनियम के क्रियांवयन पर लगाए गए प्रतिबंधों के फलस्वरूप उत्पीड़ित लोग अब पुलिस के पास जाने से डरेंगे क्योंकि उनकी शिकायतों पर तत्काल कार्यवाही नहीं होगी बल्कि लंबी जांच पड़ताल के बाद मामलों को जातिगत द्वैषता के कारण दबा दिया जाएगा। देश की 30 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या के लोगों की सामाजिक आर्थिक व जमीनी स्तर पर परिस्थितियों को न्यायालय के ध्यान में लाया जाता तो शायद सुप्रीम कोर्ट को इस कानून को निरस्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। भारत सरकार, महाराष्ट्र सरकार और संबंधित सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, विधि मंत्रालय तथा अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग इस महत्वपूर्ण व संवेदनशील मुद्दे पर न्यायालय के सामने पैरवी करने के लिए सोलीसीटर जनरल या अट्रन्नी जनरल को भेजा जाता तो सुप्रीम कोर्ट इतना कठोर फैसला देने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
बहरहाल, दलित समाज व्यवस्था से जातिप्रथा के चलते बहिष्कृत रहे हैं और उन्हें अपने अधिकारों के लिए ही संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट अत्याचार अधिनियम में बदलाव करके दलित अनुसूचित जातियों के साथ एक बहुत बड़ा अत्याचार किया है। सरकार की मिलीभगत से ये फैसला आया है जो कि निंदनीय है। सरकार अगर इस मामले पर मजबूती से पैरवी करे तो सुप्रीम कोर्ट पुनः विचार करने को मजबूत हो जाएगी।

(लेखक विविधा फीचर्स के संपादक हैं) संपर्क- 335, महावीर नगर, प्प्, महारानी फार्म, दुर्गापुरा, जयपुर-302018 मोबाइल-9829165513

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