शेखावत के जरिए नाराज राजपूत समाज को साधने का प्रयास

तिलक माथुर
राजस्थान में भाजपा से नाराज चल रहे राजपूत समाज को साधने की कोशिश करते हुए गुरुवार को भाजपा ने चुनाव प्रबंध समिति घोषणा कर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को समिति संयोजक की जिम्मेदारी सौंपी है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के प्रदेश दौरे से पहले चुनाव प्रबंध समिति की घोषणा के साथ ही शेखावत को बड़ा जिम्मा देते हुए राजपूत समाज की नाराजगी को कम करने कोशिश की गई है। केंद्रीय नेतृत्व की ओर से 16 सदस्यीय इस समिति का अध्यक्ष मदनलाल सैनी को बनाया गया है। वहीं मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे समेत 12 को सदस्य और दो सह संयोजक बनाए गए हैं। केंद्रीय मंत्री शेखावत पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष पद के प्रबल दावेदार थे। पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व गजेन्द्र सिंह शेखावत को राजस्थान का प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहता था लेकिन वसुंधरा राजे नहीं चाहती थीं कि ऐसा हो। हालांकि वसुंधरा राजे तो अब भी मन से नहीं चाहती थी कि शेखावत को कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाए। मगर अमित शाह नहीं चाहते थे कि कांग्रेस की तरह भाजपा में किसी प्रकार की कोई धड़ेबाजी हो। इस बार शेखावत की नियुक्ति से पहले शीर्ष नेतृत्व ने वसुंधरा राजे से शेखावत की नियुक्ति से पहले कोई रायशुमारी नहीं की। ध्यान रहे मैंने गत महीनों अपने ब्लॉग में स्पष्ट लिखा था कि भाजपा राजपूत मतदाताओं को राजी करने के लिए शेखावत को राजस्थान के विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रबंधन समिति का जिम्मा सौंपेगी और हुआ भी वही ! उम्मीद की जा रही है कि शेखावत इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को बखूबी से निभाएंगे। माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन
में उनकी अहम भूमिका होगी। उनकी मोहर लगने के बाद ही उम्मीदवारों का पैनल शीर्ष नेतृत्व को भेजा जाएगा। उल्लेखनीय है कि राजस्थान में राजपूत समाज भाजपा से नाराज चल रहा है, जिसे लेकर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व बहुत चिंतित है उसी के परिणाम स्वरूप शेखावत की चुनाव प्रबंधन समिति के सयोंजक के रूप में नियुक्ति की गई है। इस महत्वपूर्ण पद पर शेखावत की नियुक्ति से राजपूत समाज का गुस्सा कितना ठंडा होता है क्या वह वापस भाजपा के प्रति पहले की तरह रुख इख्तियार करता है या नहीं यह तो वक्त बताएगा मगर भाजपा ने राजपूत समाज को राजी करने के लिए यह पासा फेंका है। गौरतलब है कि राजस्थान में तीन माह बाद विधानसभा चुनाव हैं और दोनों दल भाजपा व कांग्रेस अपने अपने स्तर पर मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के प्रयास कर रहे हैं। भाजपा जहां अपनी गौरव यात्रा के जरिये लोगों को अपनी उपलब्धियां व जनकल्याणकारी योजनाएं बता रही है वहीं कांग्रेस भी संकल्प यात्रा के जरिए भाजपा सरकार की नाकामियों को गिना रही है। दोनों दलों द्वारा यात्रा के दौरान भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन कर आमजन को लुभाने के प्रयास किया जा रहे है। हालांकि राजनैतिक पण्डितों का कहना है कि भले ही दोनों दल भीड़ जुटाकर मतदाताओं को आकर्षित करने के प्रयास कर रहे हों मगर भीड़ को मतों के रूप में परिवर्तित करने में वे कितना कामयाब होते हैं ये महत्वपूर्ण है। हमने पिछले दिनों देखा कि वसुंधरा की गौरव यात्रा में सरकार के खिलाफ नारेबाजी हुई, यात्रा के दौरान सभाओं में पत्थर बाजी हुई। अब ऐसा क्यों हुआ ये चिंता का विषय है। क्या वाकई लोगों की सरकार के प्रति नाराजगी का परिणाम है या विपक्ष की सोची समझी चाल। खैर जो भी हो राजनीति में स्थितियां-परिस्थितियां बनती बिगड़ती रहती हैं। अब तीन महीने बचे हैं चुनाव में, देखना ये है कि ऊंट किस करवट बैठता है।

तिलक माथुर
केकड़ी_राजस्थान
9251022331

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