अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से मतलब दूसरों का अपमान करना नहीं है

*दी इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी अधिनियम की धारा 66 ए को असंवैधानिक घोषित करने के बाद सोशल मीडिया पर फैलने लगी है बेलगाम सांप्रदायिकता*
✍️✍️ *देश की संसद को जरूरत है इस विषय पर कानून बनाने की*

दोस्तों! शुभ प्रभात।नमस्कार।
आज जमाना सोशल मीडिया का है।हर दूसरे व्यक्ति के पास एंड्रॉइड फोन है।लगभग सभी एंड्रॉइड फोन धारक व्हाट्सएप,फेसबुक,इंस्टाग्राम का उपयोग करते हैं।अच्छी बात है।मैं वैसे तो इसे अच्छा मानता हूं।ये एक ऐसा मंच है।जिसने हम सबको एक परिवार के सदस्य की भांति जोड़ रखा है। *वसुधैव कुटुम्बकम की भावना साकार* हो रही है।लेकिन इसका बुरा असर भी बहुत हो रहा है।सोसायटी में जो गंदे लोग हैं।आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं।वो आजकल सोसायटी को छोड़कर यहां अपना चेहरे पर नकाब लगाकर बैठे हैं।हम सब रोज अखबारों में पढ़ते हैं कि आज अमुक व्यक्ति के खाते से पैसे निकल गए।बहुत सारे तरीकों से ये वारदातें रोजाना सैकड़ों लोगों के साथ हो रही है।मुश्किल से एक दो परसेंट लोग ही रिपोर्ट दर्ज कराते हैं।वो ही हम पढ़ पाते हैं।अव्वल तो कोई दर्ज करवाता नहीं है क्योंकि पैसा गया जो तो गया।समाज में लोग बेवकूफ और कहेंगे।इस डर के मारे कोई करवाता नहीं रिपोर्ट।कुछ लोग थाने तक पहुंच जाते हैं तो उन्हें टरका दिया जाता है।इसके पीछे जो महत्वपूर्ण कारण है वो है अज्ञानता। *इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी से संबंधित ज्ञान की अज्ञानता*
ज्ञान आएगा भी कहां से।मुश्किल से पुलिस विभाग में ही जिले में एक दो लोग जानते और समझते हैं।ना तो वो किसी दूसरे को सिखाकर अपनी इम्पोर्टेंस कम करना चाहते हैं।ना दूसरों के पास टाइम है।खैर ये व्यवस्थाएं है हमारी।ऐसे ही चलेगी।हम बात कर रहे हैं।सोशल मीडिया पर गंदगी फैलाने वालों की।साम्प्रदायिकता फैलाने वालों की।उनके खिलाफ कानून का शिकंजा कसना होगा।उन बेलगाम घोड़ों को रोकने के लिए लगाम रूपी कठोर कानून की जरूरत है वर्तमान हालातों में।
हमारे देश का संविधान हमें विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।ये बहुत अच्छी बात है।देश के हर नागरिक को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता होनी ही चाहिए।लेकिन हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा।जो अधिकार हमारे हैं वो ही अधिकार सामने वाले के भी हैं।अधिकारों के साथ साथ हमारे कर्तव्य हैं।हमारे संस्कार हैं हमारे नैतिक मूल्य हैं।जब तक हमारे अधिकारों में हमारे कर्तव्यों और संस्कारों को शामिल नहीं किया जाएगा ये अधिकार व्यर्थ हैं।आज जो भी कानून बने हुए हैं।उनके पीछे जो लॉजिक है,वो हमारे संस्कार ही तो हैं।हमारी परंपराएं ही तो है।उन्ही को संकलित करके ही तो कानूनी जामा पहनाया गया है।जबसे हम लोग सोशल मीडिया पर आने लगे,उससे संबंधित अपराध होने लगे तो हमारे देश की संसद को लगा कि इस पर कानून बनना चाहिए।निसंदेह आज जो कानून हमारे ऊपर लागू है। *The Information Technology Act 2000* वो सोच विचारकर विधि वेताओं से राय लेकर ही बनाया गया था लेकिन गलतियां सबसे होती है।ग़लत कानून भी बनते हैं।इसलिए ही हमारे संविधान में ये व्यवस्थाएं की गई है कि हमारे देश की संसद यदि कोई गलत कानून पारित कर देती है तो उसे हमारी न्यायपालिका सुधार करने के निर्देश दे सकती है।उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है।ऐसा ही इस अधिनियम की धारा 66 ए के संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 24 मार्च 2015 को *श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया* निर्णय पारित करते हुए इस धारा को असंवैधानिक घोषित किया।इस धारा को संविधान के आर्टिकल 19(1)(a) के विपरीत माना।बहुत अच्छा जजमेंट हमारे देश की सुप्रीम कोर्ट ने हम सबको,भारत के नागरिकों को दिया।निश्चित तौर पर यदि आज ये धारा सुप्रीम कोर्ट ने नहीं हटाई होती तो शायद मैं भी अपने विचारों को आप सब मित्रों के समक्ष नहीं रख पाता।लेकिन मित्रों हुआ क्या।इस जजमेंट की आड़ में लोग ये भूल गए कि देश में और भी बहुत सारे कानून हैं जो हमारे विचारों की अभिव्यक्ति पर रोक लगाते हैं।जो सही भी हैं।कोई भी स्वतंत्रता किसी का अपमान करने के लिए नहीं हो सकती।मानहानि का कानून इसी कंसेप्ट पर आधारित है।कोई भी स्वतंत्रता खुद के धर्म प्रचार से संबंधित होनी चाहिए।दूसरों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने का किसी को कोई अधिकार नहीं है।आज देश की संसद को जरूरत है इन सब बिंदुओं पर सख्त कानून लाने की।
(1) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अन्य व्यक्ति के अपमान के मध्य तारतम्य होना चाहिए।
(2)सोशल मीडिया पर घृणा और शत्रुता फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनना चाहिए।
(3) विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को परिभाषित किया जाना चाहिए।विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से मतलब ये नहीं होना चाहिए कि आप समाज में गंदगी फैलाओ।भाई भाई को लड़ा दो।खुद की लोकप्रियता हासिल करने की दुर्भावना
रखते हुए किसी वर्ग विशेष की भावनाओं को आहत करो।(पत्रकार अर्णब गोस्वामी से संबंधित लेख में पूरी व्याख्या करूंगा इस विषय पर)
(4) झूठी अफवाहें फैलाने वालों पर कानून का मजबूत शिकंजा होना चाहिए।ये लोग समाज के मानव बम से ज्यादा खतरनाक हैं।अजमानतीय अपराध होना चाहिए।कठोर कारावास की सजा होनी चाहिए।क्योंकि ये काम ज्यादातर राजनीतिज्ञ करते हैं।अपने निजी स्वार्थों के खातिर।
(5)अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोक व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालने वाली नहीं होनी चाहिए।शिष्टाचार और दुराचारियों के बीच की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
आज इस संबंध में स्पष्ट कानून के अभाव में भारत गणराज्य की एकता और अखंडता को प्रभावित किया जा रहा है।समाज में प्रदूषण फैलाया जा रहा है।लोगों की मानसिकता को दूषित किया जा रहा है।लोगों को किसी का भी अपमान करने की खुली छूट मिली हुई है।लोग शिष्टाचार भूल चुके हैं।हर व्यक्ति खुलकर आपराधिक भाषा का प्रयोग कर रहा है।जो किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं है।इन विषयों पर गंभीर चिंतन मनन की जरूरत है।कानून बनाए जाने से पहले जमीनी स्तर के लोगों से राय लिया जाना आवश्यक है।
माननीय प्रधानमंत्री जी एवं महामहिम राष्ट्रपति महोदय को जरिये मेल ये आर्टिकल भेज कर निवेदन कर रहा हूं कि इन विषयों पर आगामी समय में कानून बनावें ताकि हमारे समाज में व्याप्त गंदे और आपराधिक मानसिकता वाले लोगों की छंटाई कर क्वारन्टीन होम में शिफ्ट कर सकें।जय हिंद।जय भारत….
*निवेदक-डॉ.मनोज आहूजा एडवोकेट एवं पत्रकार।*
*अध्यक्ष,बार एसोसिएशन भिनाय,जिला अजमेर।पूर्व अपर लोक अभियोजक केकड़ी,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य इंडियन एसोसिएशन ऑफ लॉयर्स सुप्रीम कोर्ट नई दिल्ली।प्रदेश अध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार एवं अपराध रोधी संगठन,जयपुर*

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