-गौरव अवस्थी- ज्यों -ज्यों जागरूकता बढ़ रही है वैसे-वैसे अपराध के तरीके भी। आजकल अपराध में बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है। बच्चा समझकर लोग इन पर ध्यान नहीं देते और बचपने कि उमर में शातिर दिमाग बच्चे अपराध को अंजाम देकर गायब हो जाते हैं। शादी समारोह में जेवर उड़ाने हो या भरे बाजार मोबाइल या पर्स। ट्रेंड किये गए बच्चे सभी घटनाओ में मोहरा बनाकर आगे किये जा रहे हैं। यह केवल एक ही शहर में हो ऐसा भी नहीं है। सभी छूटे-बड़े शहरों में आजकल इसी तरीके पर अपराध कि घटनाएं हो रही हैं। लखनऊ में एक शादी समारोह में जेवर गायब हो गए। पुलिस तहकीकात में सामने आया कि दिखने में अच्छे-खासे घरों के लगने वाले बच्चे स्टेज पर धमाल मचाते देखे गए। लोगों ने गौर नहीं किया। सीसीटीवी फुटेज में वही बच्चे होटल में भी दिखे। दुल्हन के जेवर गायब होने में पुलिस का पूरा शक इन्ही अनजान बच्चों पर जा रहा है। बाजार में भी शातिर बना दिए गए बच्चे
दिल्ली का निर्भय कांड अभी तक लोग भूले नहीं होंगे। इस जघन्य बलात्कार कांड में एक 18 वर्ष से कम उम्र का बच्चा भी था। उस पर इल्जाम भी जघन्य था। निर्भया की बलात्कार के बाद हत्या पर हुए आंदोलन के दौरान कई तरफ से आवाज उठी जुवेनाइल क्राइम के सम्बन्ध में उम्र 18 से घटाकर 16 वर्ष कर दी जाए। यानी 16 वर्ष के बच्चे को ही जुवेनाइल माना जाये। कानून बनाना या ना बनाना केंद्र सरकार का काम है लेकिन जरा सोचिये , अपराध किस दिशा में जा रहे हैं। जब बच्चे तक नहीं बख्शे जा रहे हैं तो देश का भविष्य क्या होगा। हमारे देश के भविष्य निर्माता का यह कौन भविष्य बनाया जा रहा है। इसके लिए जरुरी है कि गरीबी खासकर बच्चों कि बुनयादी सुविखाओं पर सरकारों को विशेष ध्यान दिए जेन कि जरुरत है। केवल योजनाओ, कार्यक्रमों और अनुदान के प्रावधानों से कम नहीं चलने वाला है। बच्चों के विशेष प्रयास करने होंगे ताकि बाल मनो पर अपराध की इबारत लिखी ही ना जा सके। वैसे अपने देश में गरीबी में जीवन जी रहे बच्चों की करोड़ से ऊपर है। कड़ाके की सर्दी में बिना छत , बिना कपड़ों के कितने ही बच्चे सड़क पर भीख मांगते मिल जायेंगे। कुछ रुपयों-टुकड़ों के लिए ये बच्चे ना जाने कितनी जलालत सहते हैं। फिर हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि बच्चे देश -समाज की ही सोंचेंगे। पहले हम इनके भविष्य के बारे में सोंचे फिर इनसे उम्मीद करें कि यह देश-समाज के बारे में सोंचे।