क्या हम कानून की गुलामी के लिए भारत में पैदा हुए है

sohanpal singhयूँ तो कानून की व्याख्या करना बिलकुल सरल नहीं है और अगर सरल होता तो फिर हमें ईतने न्यायलयों  की आवश्यकता  ही नही होती । लेकिन जब हम यह देखते है आपराधिक कानूनो से ईतर संसदीय प्रणालियों के अंतर्गत मन्त्रियो और उनके आधिनस्त बाबुओं के द्वारा कानून में लिखी धाराओं की व्याख्या  मनमाने ढंग से की जाती है ।जैसा कि आजकल हम सब देख रहे है कि दिल्ली की केन्द्र सरकार और दिल्ली की राज्य  सरकार में जो टसल चल रही है उससे न  तो किसी नेता को कोई  हानि होगी और न ही किसी बाबु को कोई नुकसान होगा ?
हाँ अगर किसी को कोइ नुकसान होगा तो वह दिल्ली की जनता का ही होगा ।भले ही केजरीवाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए रोज नए नए सवाल खडे कर दे ते है ।लेकिन आज जो सवाल वह उठा रहे है कि दिल्ली की जनता के द्वारा चुनी हुइ सरकार को जनता की भलाई को प्राथमिकता क्योँ  न मिले ? इस कार्य  में केन्द्र  की सरकार क्यों अडंगा लगा रही है वह भी सीधे सीधे नही बल्कि राष्ट्रपति के प्रतिनिधि उपराज्यपाल के द्वारा।
अब तक जो भी हो ता रहा है वह छोटे भाई और बडे भाई की मानसिता की अवधारणा के अंतर्गत ही हो ता रहा था लेकिन केन्द्र की सरकार के प्रति आज के प्रधानमंत्री हमेंशा ही विद्रोही और कटाक्ष की भाषा बोल बोल कर प्रधानमंत्री बन सके है अच्छा होता कि केजरीवाल को केन्द्र की सरकार कानून की  प्रक्रियाओं मे न फसाँ कर पूर्ण  स्वतन्त्रता से दिल्ली वासियोँ की सेवा का अवसर दे । कयोंकि महान समाजवादी डाक्टर राम मनोहर लोहिया के  कथनानुसार जिन्दा कौमें सत्ता परिवर्तन के लिए  पाँच साल तक ईंतजार नही करती है। वैसे भी किसी शभी देश में उसका संविधान और  कानून उस दे श के नागरिको के जीवन यापन को सरल और सुविधाओं से पूर्ण भरपूर बनाने कि लिए होता है उसमे बाधा डालने के लिए नही । क्योकिं उसी कानून की धाराऔं के अनुसार आज सत्ता के मठाधीश दिल्ली मे एक ओर  जहाँ राजसी और विलासिता पूर्ण जीवन यापन कर रहे उसी दिल्ली वासियों को मकान सडक तो दूर पीने के लिए पानी तक उपलब्ध नही है। एक ओर सुरक्षा बलो की कमी  का रोना रोया जाता है तो उसी दिल्ली कुछ दिल वालो को राजसी सुरक्षा घेरा मिला हुआ है । कानून क्या अमीरों को ही संरक्षण देता हमसे अगर कोई पूंछेगा तो हम तो हाँहु कहेगें । एस०पी०सिहँ

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