– देवेन्द्रराज सुथार –
आज अंध भक्त युग चल रहा है। श्रद्धा, विश्वास और आस्था का मर्दन हो चुका है। भक्त के स्थान पर अंध भक्त काबिज हो गये है। इन अंध भक्तों के सिर पर मौत का जुनून संवार है। यह किसी भी हद तक जा सकते है। कुछ भी कर सकते है। ऐसी दीवानगी आजतक इससे पहले कभी भी नही देखी गयी। अक्ल के अंधे और दिमाग से पैदल इन अंध भक्तों को हांका जाता है प्रलोभन के डंडे से। यह आंख मूंदकर कतार में चलते है। इनकी फितरत तो देखिये ! ये गाय को मम्मी की तरह मानते है। गौ हत्या की थोड़ी से खबर या अफवाह इनके कानों में पड़ जाये तो इनका पुत्र प्रेम हिलोरे मारने लगता है और खून उबलने लगता है। लेकिन, ये अंध भक्त जिस गाय को मम्मी कहते है उसे खुले में विचरण करते देखते है। कूड़ा निगलने देते है। इन्हें गाय को माता कहना तो मंजूर है पर खुद की माता को गाय कहना कथ्य ही मंजूर नहीं है। ये प्रजाति गंगा को भी मां कहती है। लेकिन, पूरे मन से घर का समस्त कूड़ा-करकट फेंकने से लेकर मृतक अस्थियों का भोग चढाने में जरा भी हिचकती नही है। क्या कोई पुत्र अपनी मां पर ऐसे कचरा डाल सकता है ? अजीब है अंध भक्त ! जाति और धर्म के मद में बावले है।

दास प्रथा की तरह वर्तमान में अंध भक्त प्रथा चल रही है। दासों का व्यापार होता था। लेकिन, आज के दौर में ये दास भक्त बनकर अपना इतिहास दोहरा रहे है। इन अंध भक्तों में अधिकत्तर वे बेरोजगार युवा है जो हालात और भूख के सताये है। भूखे का हर अपराध क्षम्य है। इनका सियासदान और बाबा बड़े ही चतुराई से अपनी रक्षा के लिए इस्तेमाल कर रहे है। भीड़ के हुजूम में पचास-सौ अंध भक्तों को खड़ा करके पूरी भीड़ को अपने पक्ष में करने की कला उन्हें खूब आती है। ये वे मछली है जो पूरे तालाब को खराब कर रही है। सोचनीय है इन अंध भक्तों के साथ विकास का पहिया कैसे गति कर सकेगा ! जब ऐसे अंध भक्त और अंध श्रद्धा बढ़ती जायेगी तो चोटी क्या बोटी भी कटते समय नहीं लेगी। निश्चित ही काल का ग्रास हावी है। समय की चेतावनी को भांपकर चलना ही श्रेष्यकर है।