ईगो को नियंत्रित करने के कारगार उपाय

डा. जे.के.गर्ग
अपने ईगो को नियंत्रित रख कर ही जीवन में हम सफलता,सुख एवं शांति प्राप्त कर सकते हैं |
निम्नलिखित तथ्यों पर अपने अंहकार को एक तरफ रख कर मनन करें, ऐसा करने से आप जीवन की सच्चाईयों को पहचान कर आशातीत सफलताएँ प्राप्त कर सकगें |
नारायण मूर्ती एवं नन्दन नीलकेनी के बिना भी इनफ़ोसिस कंपनी सुचारू रूप से कार्य कर रही है, इंग्लिश भाषा में कावत है” No one is indispensable “ इस सच्चाई को आपको स्वीकार करना होगा कि आपके कार्यालय में अन्य सहकर्मी भी बुद्धीमान एवं चतुर है, हाँ यह हो सकता है की उनकी बुद्धीमता का स्तर आप के जितना नहीं हो |
आप इस गलतफहमी में नहीं रहें कि आपके उच्च अधिकारी या ग्राहकों आवश्यक सूचना/जानकारी सिर्फ आप ही दे सकते हैं, वें इनकी जानकारी आपके अन्य सहकर्मीयों या आपके अधिनस्थ कर्मचारियों से भी प्राप्त कर सकते हैं |

आपको दिए हुए कार्य के निष्पादन हेतु अगर आप अपने अधिनस्थ सहकर्मीयो की मदद लेते हैं तो यह आपकी कमजोरी की जगह आपकी सहजता ही कहलायेगी और इससे अन्य सहकर्मीयोंके दिल में आपकी इज्जत ही बढ़ेगी | जीवन में सदेव दूसरों को सम्मान दें किन्तु सम्मान पाने का प्रयास मत कीजिये |

अपने ईगो को अपने से दूर रक्खें | यह कहना बंद करें कि आपने इतना अधिक काम किया है, इसकी जगह अपने सहकर्मीयों/अधीनस्थ कर्मचारियों को प्रोत्साहित करें,टीम भावना से काम करें,काम की सफलता का श्रेय खुद को देने के बजाय अपनी पुरी टीम को दें | अपने सहकर्मीयों को जिम्मेदारी दे, उनके मार्गदर्शक और सलाहकार बने, उन्हें भी आपके मार्ग निर्देशन में सीखने का अवसर दें |

आप अपने परिवारजन के साथ उनके मुसीबत के समय साथ रहें, उनकी मदद करें,उनको सहयोग दें,जरूरी सलाह दें | आपने जीवन में कितना काम किया है उसे लोग समय के साथ शायद भूल भी जाये , किन्तु आपके द्वारा परिवार,समाज, आसपास के लोगों से किया गया अच्छा व्यहार, सामंजस्य प्रवर्ती और पारस्परिक मधुर सम्बन्धों की यादें उनके मानस पटल पर सदेव अंकित रहेगी |

याद रक्खें कि जो अंहकार के पत्थर बन गये थे उन्होनें अंत में हमेशा ही ठोकरें ही खायी है दूसरी तरफ दुनिया ने उसी की पूजा की है जिनके भीतर नम्रता एवं सदाशयता रही है |

ईगो दो मनुष्यों के बीच की मित्रता के बीच सबसे बड़ी दीवार बन जाती है, किसी भी बात का तिल का ताड़ और राई का पहाड बनाने में ईगो की सबसे बड़ी भूमिका होती हैं | जब परिवार में ईगो टकराता है तो परिवार का विघटन होता है |

ईगो से ही हम अपने अच्छे मित्रों को खो देते हैं, पारस्परिक सम्बंध बिगड़ जाते हैं,मन की शांती भी भंग हो जाती है एवं जीवन तनावयुक्त बन जाता है | क्रोध तब आता है जब आदमी के ईगो को चोट लगती है |अच्छा होगा आदमी अपनी जिन्दगी के घर से ईगो को अटाले की तरह बाहर फैकं दे ताकि वो खुद एक नेक दिल और अच्छा इन्सान बन सकें |

डा. जे.के. गर्ग
सन्दर्भ— विभिन्न संतों-महापुरुषों के उद्धभोंदन

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