
परन्तु एक गरीब असहाय व्यक्ति किसी समाधान को खरीदने का सामर्थय तो नही रखता है परन्तु गरीब बाप की भावनाएं भी महामारी के वक्त अपने बेटे की चिंता बहुत करती है तो ऐसे वक्त में उस परिवार के लोग भी अपनो को भुला नही पाते है तो एक गरीब माँ की कोख भी जलन और बेचैनी महसूस करती है परन्तु कर कुछ नही सकती फर्क केवल इतना सा है कि अमीर व्यक्ति समाधान खरीद लेता है और गरीब को भूख
समाधान का विचार तक नही करने देती है इस लिए उसका समाधान केवल भगवान के भरोसे ही चलता है ।
या यह कह सकते है कि सम्पन्नता की नमी में ऐसे अप्रसांगिक प्रश्नों की खरपतवार आसानी उग जाती है कि ” यह मजदूर अपने राज्य की तरफ क्यों भागना चाहते है ”
परन्तु भूख के बीहड़ में गरीब की नजर केवल एक निवाले की कल्पना ही कर सकती है प्राप्ति के लिए तो वह केवल सरकार पर निर्भर है और वह जिस सरकार पर निर्भर है वह संवेदनहीन व गूंगी और बहरी है ।
इस लिए हालात नाजुक है ।
महेंद्र सिंह भेरून्दा