*मत रोको मुझको , अपने घर जाने दो*

बी एल सामरा “नीलम “
गर लौट सका तो जरूर लौटूंगा, तुम्हारा शहर बसाने को।
पर आज मत रोको मुझको,
बस मुझे अब जाने दो ।।
मैं खुद जलता था , कारखाने की भट्टियां जलाने को,
मैं तपता था , धूप में तुम्हारी , अट्टालिकायें बनाने को ।
मैंने अंधेरे में खुद को रखा,
तेरा चिराग जलाने को।
मैंने हर जुल्म सहे ,भारत को आत्मनिर्भर बनाने को।
पर अब मैं टूट गया हूँ ,समाज की बंदिशों से।
मैं बिखर गया हूँ जीवन की दुश्वारियों से।
मैंने भी एक सपना देखा था भर पेट खाना खाने को।
पर पानी भी नसीब नहीं हुआ,
दो बूंद आँसूं बहाने को।
मुझे भी दुःख में मेरी,
माटी बुलाती है।
मेरे भी बूढ़े माँ-बाप
मेरी राह तकते हैं।
मुझे भी अपनी माटी का कर्ज़ चुकाना है।
मुझे अपने माँ -बाप को ,
वृद्धाश्रम नहीं पहुंचाना है।
मैं नाप लूंगा सौ योजन ,
पांव के छालों पर।
मैं चल लूंगा मुन्ना को
रखकर अपने कांधों पर।
पर अब मैं नहीं रुकूँगा,
जेठ के तपते सूरज में ।
मैं चल पड़ा हूँ ,
अपनी मंज़िल की ओर ।
गर मिट गया गाँव की मिट्टी में ,
तो खुशनसीब समझूंगा ।
औऱ गर लौट सका तो ,
जरूर लौटूंगा, फिर से तुम्हारा शहर बसाने को ।
पर आज मत रोको मुझको,
बस मुझे अब जाने दो ।।

प्रस्तुति सौजन्य
*बी एल सामरा नीलम*
पूर्व शाखा प्रबंधक
भारतीय जीवन बीमा निगममंडल कार्यालय अजमेर

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