जीवन बीमा परिवार से, जुदाई ! अब सेवा निवृत्ति की बेला आई ।

*अपना अब घर परिवार*
हमारा सुखी संसार
*मेरी हमसफ़र*
*(मेरे सपनों की शहजादी)*

मैं तब भी झुक कर के बाँध-
दिया करूँगा ,
तुम्हारे पैरों में पायल..
हाँ उस उम्र में भी ,
जब मेरे घुटनों मे दर्द होता होगा।
मैं तब भी सँवार दिया करूँगा, करीने से तुम्हारे ,
अधपके बालों को..!
हाँ उस उम्र में भी ,
जब मेरी उँगलियाँ कांपती होंगी. !.
मैं तब भी लगा दिया करूँगा, तुम्हारी आँखों में ,
बारीकी से काज़ल..
हाँ उस उम्र में भी जब मुझे ,
थोड़ा कम दिखता होगा ।
मैं तब भी लगाऊँगा तुम्हारे साथ उलूल जुलूल शर्तों को..!
हाँ उस उम्र में भी जब
मुझे पता हो कि इसमें बस
मेरी हार लिखी है।
मैं खेलूँगा हर शाम तुम्हारे
साथ आँख मिचौली.. !
हाँ उस उम्र में भी जब पता हो
कि मेरे पास छुपने के लिए
बस तुम्हारा दिल ही है..!
मैं लूँगा तुम्हारे साथ हर
सालगिरह पर सेल्फी के
एक दो शॉट्स..!
हाँ उस उम्र में भी जब पता हो ,
कि इससे ज्यादा तो नशा मुझे तुम्हें देखने भर से होगा !
मैं सुनाऊँगा हर रोज़ अपनी लिखी शायरियाँ !
तुम्हारे सोने से पहले..
हाँ उस उम्र में भी जब पता हो कि मेरी शायरी तुम ही तो हो..!
मैं जगाउँगा हर सुबह तुम्हें
अपने हाथों की चाय पिलाकर..।
हाँ उस उम्र में भी जब
तुम झगड़ोगी कि मुझे चाय बनाने नहीं आती।
मैं सुनाऊँगा बारिश के दिन
गिटार पर ,
तुम्हें किशोर दा के गाने.. ।
हाँ उस उम्र में भी जब तुम जगजीत सिह की गजल
सुनने की ,करोगी जिद !
मैं हमेशा तुम्हें खुश रखूंगा ,
खुद से भी ज्यादा..!
हाँ उस उम्र में भी जब
तुम्हारी खुशी ही बस ,
मेरी खुशी होगी !!

प्रस्तुति सौजन्य
*बी एल सामरा नीलम*
पूर्व प्रबन्ध सम्पादक
कल्पतरू हिन्दी साप्ताहिक एवं मगरे की आवाज पाक्षिक पत्र

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