नाकाफी प्रयासों से नाकामयाब खड़े हम

कोरोना: कारगर नही उठे कदम, तो स्थिति होगी बदत्तर
कोरोना का रोना देश में मातम की तरह पसरा हुआ है। अफसोस यह है कि तेरह महीनों से अधिक समय से हमारे बीच मौजूद इस क्रूर शत्रु से निपटने में आज तक हम नाकामयाब रहे है। ये सब हालात हमारे सामने तब खड़े है जब हमें इसकी विकरालता को जूझ चुके देशों से सबक लेकर इंतजामों को अंजाम देना था। अमेरीका, ब्रिटेन, फ्रांस ये देश ऐसे है जो आबादी के मामले में हमारे से कम और संसाधनों ककी दृष्टि में हमसे कई गुना आगे है। कोरोना से जब ये देश जूझ रहे थे, हम सोये रहे और वे अपनी अवाम को महामारी से मुक्ति दिलाने के लभगभ करीब है तब भी हम नींद खुलना बाकि है। यूरोपिय व अमेरीकी देशों में कोरोना संक्रमण के शुरूआती दौर में ही डब्ल्यूएचओ समेत विश्व की प्रमुख वैज्ञानिक संस्थाओं तथा वायरस पर काम कर रहे खास वैज्ञानिकों ने इसके भारत के साथ विश्व भर में फैलने को लेकर आगाह कर दिया था। कोरोना को लेकर हमारे देश में मार्च 2020 में सरकारों ने प्रभावी कदम उठाने के प्रयास करने की सोची। इसे भगवान की मेहरबानी ही कहा जाएगा कि कोरोना की पहली लहर हमारे यहां कहर नहीं बरपा पायी। इस मेहरबानी को ङमारे नेताओं ने कामयाबी मान लिया और दूसरी लहर की 100% आशंकाओं के बावजूद देश में कारगर उपायों को दरकिनार कर हमारी प्राथमिकता में चुनाव व कुंभ के आयोजन आ गए। जिसके लिए देश का शीर्ष नेतृत्व तो जिम्मेदारी है ही साथ में सभी राजनीतिक दलों की भूमिका भी नकारने योग्य नहीं है।
देश आज जब नाकाफी प्रयासों के चलते नाकामयाबी के स्तर खड़ा है, ऐसे में भी शायद देश का संचालन कर रहे लोग कारगर कदम उठाने के बजाय एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ने में मशगूल है। दूसरी तरफ कोरोना अब तक अपने चरम की तरफ बढ़ता जा रहा है। इन हालातों में जब इस पर रोक के सभी उपायों के तहत हमें स्वास्थ्य सेवाओं, स्वास्थ्य संस्थानों तथा वैक्सीन, आक्सीजन, वैंटिलेटर से लैस होना था हम हथियार डाले दुश्मन के सामने खड़े है। अभी तक उपायों की कमी या उन्हें पूरे करने की दिशा में बहस के बजाय शीर्ष नेतृत्व व लगभग सभी राज्यों के सिपहसालार एक-दूसरे की टांग खिंचाई में लग रहे है। गांव, कस्बों तथा शहरों में रोज सुलगते श्मशान, कब्रिस्तानों में दफन होती लाशों तथा गंगा किनारें पड़े सैंकड़ों शवों को लेकर देश में राजनीति की लहर चल रही है। देश की अवाम जहां हरकतों स अवाक है और दुनियां के देश धिक्कार भरी, बेचारगी भरी नजरों से देख रही है। नेता अपनी इन नाकामयाबियों, हर रोज बढ़ते संक्रमण व मौतों के आंकड़ों का मंजर देख कर झूठे, बेबुनियाद तथा ओछे हथकंडे अपनाने से बाज नहीं आ रहे है। दूसरी तरफ न केवल देश की जनता बल्कि विश्व के सभी देश कोरोना महामारी को लेकर भारत के नाकाफी प्रयासों तथा नाकामयाबी को विश्व के लिए खतरे के भयाक्रांत है।
कोरोना को लेकर प्रकाशित समाचारों को भी सही माना जाए तो पिछले कुल 40 दिनों में जब महामारी ने अपने पांव तेजी से पसारना शुरू किए अब तक संक्रमण जहां दो गुना बढ़ा है वहां वैक्सीनेशन आधा तक आ कर रह गया है। देश के प्रमुख व बड़े दस राज्य जिनमें यूपी, मध्यप्रदेश, राजस्थान, कनार्टक, बिहार, महाराष्टऱ्, गुजरात, दिल्ली, बिहार, हरियाणा में संक्रमण में आंकड़ों में कमी भले ही आई लेकिन मौत के सिलसिला व संख्या किसी प्रकार से कम होने का नाम नहीं ले रही है। तमिलनाडू, के साथ देश के छह पूर्वोंत्तर राज्यों, असम, त्रिपुरा, नागालैंड, मणीपुर, मेघालय, सिक्किम तथी मिजोरम में संक्रमण दर में तेजी से इजाफा होता जा रहा है। जहां तक वैक्सीन की उपलब्धतता का सवाल है देश में शीर्ष नेतृत्व से लेकर वैक्सीन निर्माण से कंपनियों के पास पुख्ता जवाब नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन तक कह चुके है कि दिसंबर तक 213 करोड़ वैक्सीन की उपलब्धतता संभव है। ऐसे में कोरोना काल के सन् 2022 में पहुंचने की कोई आशा देश की अवाम को नहीं करनी चाहिए।
देश के इन हालातों से हमारे नेता भले ही चिंचित नहीं हो लेकिन विश्व में महामारी पर रोक की दिशा में काम कर रहे देश इसे नया खतरा मान कर चल रहे हैं। गंगा में तैरती लाशों का वैश्विक समाचार पत्रों में प्रकाशन हमारे लिए शर्मनाक हो या नहीं विश्व के लिए भय पैदा करने वाला जरूर है। वैज्ञानिक आशंका जता चुके है कि भारत की वैक्सीनेशन को लेकर ढि़लायी में कोरोना वायरस म्यूटेन कर सकता है। जो वैक्सीन मौजूदा समय में कारगर साबित हो रही है, कोरोना वायरस के बदलते स्वरूप में कारगर भी साबित न हो। इसके साथ ही गंगा में तैरती लाशों के कारण नया संक्रमण फैल सकता है और नई महामारी इसमें उपस्थिति दर्ज करा सकती है। जो सारी दुनियां के लिए खतरा बन जाएगी। अमेरीका कोविड रिस्पॉन्स टॉस्क फोर्स की सदस्य डा. सायरा मडाड ने भारत में कोरोना को लेकर पारदर्शी डाटा के अभाव को सबसे बड़ा कारक माना है। राज्यों में सरकारी आंकड़ों को ही पूरा सच माना जा रहा है, जबकि वह अधूरा भी नहीं एक-चौथाई सच से ज्यादा कुछ नहीं है। श्मशान व कब्रिस्तान इसका जीता-जागता उदाहरण पेश कर रहे है। देश के पीएम नरेंद्र मोदी जी तक इसके लिए राज्यों को निर्देशित कर चुके है कि आंकड़ों की सच्चाई को छुपाया नहीं जाए। सच भी है हकीकत को झुठला कर हम किसी महामारी का इलाज कैसे कर पाएंगे?

-निर्मल मिश्र –

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