Dinesh Gargहमारे जीवन में अंशाति बढऩे का एक कारण यह भी है कि हम जीवन में जैसे ही दूसरे जैसा बनने का प्रयास प्रारंभ करते है तभी अपनी वास्तविकता को खो देते है। हम यह भूल जाते है कि हम भी परमात्मा की सर्वोष्ट कृति है और हम वह सभी कुछ प्राप्त कर सकते है जो दूसरो के पास है, लेकिन दूसरे के स्वरूप जैसा बनने का प्रयास ही सफलता में बाधक होता है। एक सफल व्यक्तित्व जो पहनता है, जैसी जिदंगी जीता है उसे देखकर हम इतने प्रभावित हो जाते है कि हम अनायास ही वैसा बनने का तनाव अपने भीतर बना लेते है। दूसरो से अपनी तुलना कर हम आज की अपनी खुशी को खो देते है। मेरा मानना है कि हम जैसे है वैसे ही श्रेष्ठता के साथ अपने कर्तव्य की पूर्ति करते रहे। ऊंच पद पर आसीन या समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति भी हमारे जैसे ही एक इंसान होते है पर उनमें यही फर्क होता है कि वे अपने स्वयं के लक्ष्य पर केन्द्रित होते है। प्रयास यह करे कि अपने व्यक्तित्व का अपने अनुरूप निर्माण करे। प्रकृति ने भी हमे जो स्वरूप, स्वभाव, कद, रंग प्रदान किया है उस जैसा शायद ही कोई दूसरा हो। कथन सत्य हो तो अपने व्यक्तित्व की दिशा स्वयं के अनुरूप तय करे।