संस्कृत -एक जिंदा भाषा

रास बिहारी गौड़
संस्कृत को लेकर बाहरी शोर के बीच भाषा के साहित्य तक ना पहुँच पाने का असहाय बोध दब सा जाता है।
बाहरी शोर में गौरव और अज्ञान एक साथ उसी तरह बसा हुआ है जैसे किसी साफ सुधरे घर मे अकर्मण्य-विलासिता पाँव पसार कर लेटी हो। *अतीत का गुणगान और भविष्य की चमक के बीच वर्तमान के लिए कोई कोना नहीं दिख रहा है।*
स्व का असहाय बोध अपनी भाषा (हिंदी) मे संस्कृत की अनुपस्थिति से उसी तरह आहत है जैसे कोई पुरखो का तर्पण करते हुए उनका नहीं होना याद करता है..। तर्पण ही की तरह मंत्रोच्चार की भाषा बनी संस्कृत आँख-कान बंद करके पढ़ी और सुनी गई..। उसे धर्म/आस्था से जोड़ दिया गया..। देवालयों के आदेश की भाषा माना गया।… विवेक विमर्श, विचार, के वलय से बाहर धकेल दिया गया।.. अवसान के आसान तर्क विदेशी आक्रांताओं के शोषण में ढूंढे लिए गए।.. सच जो हो, एक समृद्ध भाषा से हम वंचित रहे.., वंचित हैं.., उस जमीन की जानिब जो बंजर होकर कागजी दस्तवेज़ों में कहीं खो गई है।
हर भाषा का अपना प्रार्दुभाव है.. अपना इतिहास है.. अपना गौरव है..अपना समाज है ..। किन्तु भाषा की असली पहचान उसमें रचा गया साहित्य ही है। जिसे सतत सृजित किया जाता है..सहेजा जाता है..सँवारा जाता है..।
वही भाषा दुनिया मे बड़ी हुई जो..अनुवाद के माध्यम से साहित्य दूसरी भाषाओं आवाजाही करती रही..। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि अमुक भाषा को बोलने वाले इतने लोग है या कम्प्यूटर के लिए कितना सुगम भाषाई बाजार है । यह सब उसी तरह आभासी गर्वोक्तियाँ हैं जैसे फ्लैट में एकाकी जीवन के लिए फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में पाँच हजार दोस्तो की भीड़ का जमा होना।
बातचीत या संवाद भाषा का न्यनतम उपयोग है। *बोलने से भाषाएं जिंदा नहीं रहती .., जीने से रहती है।* संस्कृत इसलिए नहीं बची है कि जन्म-परण-मरण से लेकर महामृत्युंजय जाप तक उस भाषा मे होते है बल्कि इसलिए जिंदा है क्योंकि इसके पास पाणिनि, कालिदास, वाल्मीक हैं ..। अंग्रेजी साम्राज्य का सूर्य अस्त होने के बावजूद शेक्सपियर-मिल्टन उसके अमिट सवेरे रच गए। फ्रांस में मोपासां, अमेरिका के हेन्स, फ़ारसी के फिरदौसी, रशियन को चेखव, टॉलस्टॉय, उर्दू के गालिब, अवधि के तुलसी बांग्ला के टैगौर ये सारे नाम अपनी सृजनशीलता के साथ हिंदी में आये.. । हिंदी समृद्ध हुई..। शेष भाषाओं का आधार व्यापक हुआ…।
तमिल, संस्कृत से भी पुरानी भाषा है..। वह आज भी साहित्य रच रही है..अनुदित होकर दूसरी भाषाओं के सम्पर्क में हैं..और सबसे बड़ी बात उसने स्वम को पत्थर बनाकर मंदिर-मस्जिद में नहीं जड़ा..। इसीलिए उसके अस्तित्व पर कोई संकट नहीं है।
*भाषा को पाषाण में नहीं, धड़कते शब्दो मे जिंदा रहना चाहिए..।*संस्कृत को हमनें पत्थरो और शिलाओं की भाषा बना दिया .।.यहीं वजह रहीं कि उसमें लिखे शब्दो को हम कभी जी नहीं पाए….महसूस नहीं कर पाए..।*
सच है कि भाषा का रोजगार से जुड़ा होना उसे अतिरिक्त ऊर्जा देता है..सत्ता का चरित्र भाषाई आग्रह निर्मित करता है ..। इस सबके बावजूद भाषा का मूल उसका साहित्य ही है।
संस्कृत को एक भाषा की तरह गौरव दिलवाने के लिए उस ढोंगी शोर से बचना होगा जो उसे दैवीय भाषा बनाते हैं..। भाषा का लेखन पौरणिक या भक्ति रस की प्रधानता लिए होना उसकी ताकत है…, कमजोरी नहीं..। दुनिया का सर्वश्रेष्ठ श्रृंगार, प्राकृतिक सौंदर्य, नीति-संहिता इसी भाषा मे लिखी गईं है..। साहित्य को समृद्ध करने के लिए उस भाषा मे लगातार लेखन के साथ निरन्तर दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी अपरिहार्य हैं..ताकि हम दुनिया को जाने ..दुनिया हमें जाने..। हम बहुभाषी संसार मे उत्तरोत्तर समृद्ध हो।

*रास बिहारी गौड़*

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