– आचार्य डॉ.लोकेशमुनि-
पर्युषण पर्व जैन समाज का एक ऐसा महान पर्व है जो प्रति वर्ष सारी दुनिया में मनाया जाता है। चाहे श्वेतांबर हो या दिगंबर, जैनधर्म के सभी पंथों एवं शाखाओं के अनुयायियों द्वारा इस उत्सव को आत्मशुद्धि तथा क्षमा जैसे विशिष्ट कार्यों हेतु मनाया जाना इस पर्व का अनूठापन है। दरअसल यह आत्मशुद्धि और आत्मसिद्धि का पर्व है। यह व्यक्ति की शुद्धि और जीवन शुद्धि का पर्व है। इस पर्व पर हम अपनी गलतियों पर सोचने और उन्हें सुधारने का प्रयास करते हैं जिससे साल भर हम जहां-जहां भी गिरें वहां संभले और नए संकल्प के साथ सुकृत्य का दीप जलाएं। आत्मा से आत्मा की संधि ही पर्युषण की मौलिकता है, इसलिए पर्युषण के दिन हमारे लिए आइने जैसे हैं जिनसे हम साल भर के सारे कार्यों को निहार सकते हैं। गलतियों के लिए क्षमा प्रार्थना करते हुए प्रेम और मैत्री को, सदाचार, सौहार्द और सद्विचार को गले लगा सकते हैं। इसीलिए तो पर्युषण महापर्व है।
प्रति वर्ष मनाया जाने वाला यह महापर्व एक आध्यात्मिक प्रयोगशाला है। इस अवसर पर हमें अपने मन की गांठों को खोलना चाहिए। गांठ चाहे ईख की हों या मन की उनमें रस नहीं आता। इसलिए हम पर्युषण का पावन अवसर पर मन की गांठों को खोलने एवं मन को मांजने का प्रयोग हैं। इस पर्व में हम अपने को अधिक से अधिक शुद्ध करने का प्रयास करते हैं। इस पर्व में प्रेम, क्षमा, संयम, अनुशासन और सच्ची मैत्री का व्यवहार करना चाहिए लेकिन होता यह है कि इन आठ दिनों में भी लोग ज्यादा ऊंच-नीच बोल जाते हैं। करना होता है अमृत पान परंतु परस्पर लड़ते-झगड़ते हुए कर लेते हैं विषपान। इसके लिए हमें ज्ञान ज्योति को जगाना चाहिए और मन की सभी परतें खोलनी चाहिए। इसी के साथ हमें अपने खान-पान पर पुनः विचार करना चाहिए कि हम कभी जीभ के वशीभूत, फैशन से अभिभूत या किसी अन्य कारण से अभक्ष वस्तुओं का सेवन तो नहीं कर रहे हैं। शराब या तंबाकू आदि का सेवन तो हम नहीं कर रहे हैं जो हमें धर्म के मार्ग से परे करता है और हमारे हृदय, मन व बुद्धि को दूषित करता है।
पर्युषण पर्व का अंतिम चरण, क्षमा वाणी या क्षमा याचना है। भगवान महावीर ने कहा था कि ‘‘मैं सभी से क्षमा याचना करता हूं। मुझे सभी क्षमा करें। मेरे सभी प्राणी मित्रवत हैं और मेरा किसी से वैर नहीं है।’’ वास्तव में केवल पर्युषण पर्व के दौरान ही नहीं बल्कि साल भर हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि इस वाक्य में जीवन को उत्कृष्ट और उदार बनाने वाली कितनी अच्छी भावना है।
पर्युषण महापर्व वर्षभर जीये गये आध्यात्मिक जीवन का गुणनफल है। हमने बीता समय कहां, कैसे, किसके साथ जीया, कितना त्याग, संयम एवं अनुशासन का प्रयोग किया, इन सबकी यह व्याख्या करता है। यह वर्षभर में जाने-अनजाने कर गई भूलों का प्रायश्चित है। भविष्य में असद् संस्कारों एवं विकारों को सीमा देने की प्रतिज्ञा है और वर्तमान में स्वयं के द्वारा स्वयं को देखने एवं आत्म-निरीक्षण का जीवंत सन्देश है।
पर्युषण महापर्व बहिर्मुखी वृत्तियों का नियंत्रण-कक्ष है। यह महत्वाकांक्षाओं को थामता है। इन्द्रियों की आसक्ति को विवेक द्वारा समेटता है। मन की सतह पर जमी राग-द्वेष की दूषित परतों को उघाड़ता है। क्या करना सार्थक जीवन के लिये जरूरी है, इसका ज्ञान देता है। यह संयम एवं त्याग की चेतना को जगाने का दुर्लभ अवसर है, जो शरीर और मन दोनों की शुद्ध चिकित्सा करता है, इससे शरीर और मन दोनों में संतुलन और लयबद्धता उत्पन्न होती है।
आज पर्युषण महापर्व की अधिक प्रासंगिकता है, क्योंकि समूची दुनिया संकटग्रस्त है, अब तक के मानव जीवन में ऐसे विकराल एवं विनाशक संकट नहीं आये। एक तरफ कोरोना महामारी का संकट है तो दूसरी ओर तालीबानी हिंसा एवं अराजकता का माहौल है। हमें उन आदतों, वृत्तियों, महत्वाकांक्षाओं, वासनाओं, इच्छाओं को अलविदा कहना होगा जिनका हाथ पकड़कर हम उस ढलान पर उतर गये जहां रफ्तार तेज है और विवेक का नियंत्रण खोते चले जा रहे है, जिसका परिणाम है, मानव का विनाश, जीवनमूल्यों का हृास एवं असंवेदना का साम्राज्य। आज की मुख्य समस्या यह है कि आदमी किसी दूसरे को आदमी की दृष्टि से नहीं देख रहा है। वह उसे देख रहा है धन के पैमाने से, पद और प्रतिष्ठा के पैमाने से, शक्ति एवं साधनों से।
पर्युषण महापर्व अहिंसक जीवन की प्रयोगशाला है। प्रश्न है कि हिंसा का उदय कहां से होता है? हिंसा कहीं आकाश से तो टपकती नहीं है, न जमीन से पैदा होती है। हिंसा पैदा होती है आदमी के मनोभावों से। हिंसा का मनोभाव न रहे तो हथियार बनाने वाले उद्योग अपने आप ठप्प हो जाएंगे। विकृत मानसिकता, हिंसा एवं महत्वाकांक्षाओं की ही निष्पत्ति है कोरोना महामारी एवं तालीबानी स्थ्तिियां। इंसान का भीतरी परिवेश विकृत हो गया है, उसी की निष्पत्तियां हैं युद्ध, महामारी, प्रदूषण, प्रकृति का दोहन, हिंसा एवं भ्रष्टाचार। जबकि भीतर का सौंदर्य है अहिंसा, करुणा, मैत्री, प्रेम, सद्भाव और आपसी सौहार्द। पर्युषण महापर्व एक अनूठा अवसर है जो सबको समान रूप से देखने का मनोभाव देता है। जब यह भीतर का सौंदर्य नहीं होता तो आदमी बहुत समृद्ध होकर भी बहुत दरिद्र-सा लगता है। सुंदर शरीर में कुष्ठरोग की तरह शरीर के सौंदर्य को खराब कर रही यह महामारी। इस बात का खुला ऐलान कर रही हैं कि सृष्टि का चेहरा वैसा नहीं है, जैसा कोरोना महामारी एवं युद्ध के मंडराते बादलों के दर्पण में दिखता है। चेहरा अभी बहुत विदू्रप है। मानवता के जिस्म पर गहरे घाव हैं, जिन्हें पलस्तर और पैबंद लगाकर भरा नहीं जा सकता। दुनिया के निवासियों में गहरी असमानता है। कुछ लोगों के पास बेसूमार सुख-सुविधाओं के साधन, रिहाइसी बंगले और कोठियां हैं तो बाकी आबादी को मुश्किल से रात को छत उपलब्ध हो पाती है। यह असमानता एवं गरीबी-अमीरी का असंतुलन समस्याओं की जड़ है। इन्हीं जटिल स्थितियों के बीच पर्युषण महापर्व समानता, सौहार्द, संयम एवं अनुशासन की प्रेरणा का माध्यम है। यह स्वतंत्रता-समानता के अहसास का पर्व है। स्वयं द्वारा स्वयं के अनुशासन की सीख है। जहां मनुष्य विचारों के खुलेपन से विवेक, समझ एवं दूरदर्शिता प्राप्त करता है, वहां वृत्तियों का अनुशासन एवं संयम उसे उन सब बुराइयों से बचाता है जिनका परिणाम होता है चरित्र की गिरावट एवं जीवन मूल्यों का हृास।
वर्तमान युग की समस्याओं का समाधान है अहिंसा, आपसी भाईचारा, अयुद्ध एवं करुणा। इस तरह बाहरी सौंदर्य को बढ़ाने के लिये पहले भीतर का सौंदर्य बढ़ाना होगा और उसके लिए पर्युषण की साधना सर्वोत्तम साधन है। उसमें दया है, प्रेम है, मैत्री, करुणा, समता है, संवेदनशीलता है। जितने भी गुण हैं, वे सब पर्युषण महापर्व की ही परिक्रमा कर रहे हैं, उसके परिपार्श्व में घूम रहे हैं। संयम एवं अहिंसा ही जीवन का सबसे बड़ा सौन्दर्य है। उसका विकास करने के लिये पर्युषण महापर्व की साधना चाहिए। कैसे हो, यह हमारे सामने एक प्रश्न है। स्वयं से स्वयं के संवाद का यह एक प्रयोग है। प्रेरक वक्ता टॉनी रॉबिन्स कहते हैं, ‘हमारे जीवन की गुणवत्ता इस बात का दर्पण है कि हम खुद से क्या सवाल पूछते हैं।’
पर्युषण महापर्व एक आध्यात्मिक अनुष्ठान है, आत्म-शुद्धि का प्रयोग है। जो व्यक्ति इस प्रयोग को करता है, वह सब बुराइयों को विराम देता है। फिर आदमी का कहना एक प्रकार का है और आचार-प्रचार-विचार दूसरे प्रकार का नहीं रहता है। ऐसे बहुत सारे लोगों को देखा है जो बड़े धर्मात्मा है, विद्वान और पंडित हैं किन्तु आचार और व्यवहार की दृष्टि से शून्य हैं। उनका व्यवहार इतना रूखा और कटु होता है कि दूसरा कोई भी व्यक्ति उनके साथ रहना नहीं चाहता, पास में जाना भी पसंद नहीं करता। प्रश्न है क्यों? इस भौतिकवादी वातावरण में जीवन के उद्देश्य की उचित मीमांसा जरूरी है, और पर्युषण पर्व इस मीमांसा का अवसर देता है।
प्रेषक- आचार्य लोकेश आश्रम, 63/1 ओल्ड राजेन्द्र नगर, करोल बाग मेट्रो स्टेशन के समीप, नई दिल्ली-60 सम्पर्क सूत्रः 011-40393082, 9821462696,