
इसके बाद शिष्य की रूहानी चढ़ाई तेज गति से होती है! आज्ञा चक्र का श्वेत बिंदु ( यह एक त्रिकोण में होता है) बढ़ते बढ़ते प्रकाश का बड़ा गोला बन जाता है! इसमें लाखों चमकदार गोल-गोल धारियां होती हैं! यह गोला सहस्त्रार चक्र में या कपाल में दिखाई देता है! यहां स्पंदन महसूस होता है! सांस यहां तक पहुंचने लगती है! नाभि मंडल से उठी हुई सांस सीधी यहां टकराती है! साधक को अपनी रूह इसी प्रकाश के गोले में स्थिर करनी पड़ती है! यदि साधक खुद ऐसा नहीं कर पाता है तो फिर गुरु का नूरानी रूप उसे खींचता है! यहां ही गुरु तत्व है और यही चेतन तत्व है और यहां ही आत्म तत्व है! यही शिष्य गुरु और ईश्वर की एकरूपता है! रूहानी मेराज की पूर्णता यही संपन्न होती है!