
जो पेड़ लगाते हैं
प्रेम करते हैं
अकेले में गुनगुनाते हैं
बच्चों के साथ
बच्चा बनकर खेलते हैं
अच्छे नहीं होते वें लोग
जो रास्ते मे पड़े फूलों को कुचलते चलते हैं
चेहरे पर रोज नया चेहरा लगाकर घर से निकलते हैं
ऊँचाई पाने के लिए नीचे गिरने को हुनर मानते हैं
बुरे होते हैं वे लोग
जो संगीत के सुरों को शोर समझते हैं
शब्दों को झंडा बनाकर मीनारों, मकानों पर टांग देते हैं
बच्चों के हाथों से किताबें छीनकर नारें थमा देते हैं
जो स्वयं को दुनिया का अंतिम आदमी समझते हैं
सबसे अच्छे होते हैं वे लोग
जो रास्ते मे पड़े पत्थर को एक ओर हटा देते हैं
आसमान में टूटे तारे को देखकर दुःखी हो जाते हैं
किसी आंख का पौंछकर
अपनी गीली अंगुलियो को सबसे छिपा लेते हैं
शायद इन्ही के भीतर कहीं कोई ईश्वर रहता हैं
*रास बिहारी गौड़*