कोविड़ अमृत

कहर बरस रहा है कोविड़ का,
जो थमने का ना ले रहा नाम।
इतने संघर्षो के बावजूद भी,
कम होने का ना ले रहा नाम।।

ऐसे लगता है जैसे कोविड़ ने,
पीया कही अमृत का प्याला।
और प्रकृति रूठी यें हम सबसे,
थोड़ा अमृत हमें भी पिलाना।।

तुझमे बहुत यें जड़ी-बूटी फैला,
बहुत पहले ये बात हमने सुना।
निर्धन अमीर सबको है बचाना,
फिर से एक चमत्कार दिखाना।।

तुझमे है हर एक रोग की दवा,
मृत मानव भी कर देती जीवा।
आज लाज रखलो माँ प्रकृति,
तेरे में सब की जान है बसती।।

आज भगा दो देश से कोविड़,
फिर बनादो पहले जैसे शोलिड़।
चाईना ने सबको दिया है धोखा,
हमको भी मिलेगा कभी मौक़ा।।

ऐसा मचाया सभी और तबाही,
सभी देश मिलकर करे भरपाई।
गणपत का यही कहना है भाई,
जल्द से मिट जाएं ऐसी तबाही।।

सैनिक की कलम
गणपत लाल उदय अजमेर राजस्थान
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