माननीय ग़ुस्से में हैं। ग़ुस्से में रहते हैं। यूँ ग़ुस्से में रहने की उनके पास हर समय कोई ना कोई वजह होती ही है ।कभी वे इस बात पर ग़ुस्सा करते हैं कि लोग उनकी इज्जत नहीं करते तो कभी इस बात पर ग़ुस्सा हो जाते हैं कि लोग उनकी बिना बात इज्जत क्यों कर रहे हैं ।
माननीय को ग़ुस्सा दिलाने के लिए बस इतना पूछना होता है, “और,क्या चल रहा है ..?” कभी कभी तो बिना पूछे , वह इस बात पर ग़ुस्सा कर जाते हैं कि आपने उनसे कुछ पूछा क्यों नहीं। उनके ग़ुस्से की जद में सामने वाला वैसे ही फँस जाता है जैसे दो दाने के फेर में मछली जाल में फँस जाती है ।
ग़ुस्से के मामले में पिछले दिनों, माननीय का सीधा मुक़ाबला सूरज से चल रहा था। सूरज आसमान से आग बरसा रहा था और माननीय समाचार चैनलों से आग बटोर रहे थे। इनशॉर्ट सूरज गर्मी से तपा रहा था और माननीय चुनावों की गर्मी से तपे पड़े थे। तपने -तपाने में सूरज की डिग्री की पचास पार की टक्कर में माननीय चार सौ पार का नारा बुलंद कर रहे थे। बहरहाल, बिना मानसूनी दस्तक के सूरज का और चुनाव परिणामों से माननीय का पारा कम हो गया था..फिर भी ताप है कि जाता ही नहीं..।
आज सुबह माननीय के ग़ुस्से से हमारी अनचाही मुठभेड़ हो गई। वह हुआ यूँ कि माननीय को सामने से आता देखकर हमारे मुख से अभिवादन स्वरूप “जय श्री राम“ निकल गया। उन्होंने मुनि दुर्वासा का सा आक्रोश आँखो में भर हमें यूँ देखा मानो अभी के अभी भस्म कर देंगे। इससे पहले कि हम कुछ समझ या बोल पाते, वे दहाड़ उठे, “ कोई ज़रूरत नहीं है जय श्री राम कहने की। जिस नारे को लेकर हमने अधोध्या बसाई , जिस नारे के साथ राम को अयोध्या में बसाया, आज उसी नारे को अयोध्या ने पीठ दिखा दी..अयोध्या ना राम की हुई , ना जानकी की .. वह केकैकी की है वहाँ के लोग मंथरा है ।”
हमने दुस्साहस नुमा साहस करके पूछा ,” माननीय इसने श्री राम का क्या दोष है..आप राम पर या अयोध्या पर ग़ुस्सा क्यों हो रहे हो..?”
बस फिर क्या था वे अपने ग़ुस्से को बहुगुणित कर हम पर ऐसे बरसे ,जैसे हुड़दंग में फँसे किसी भिखारी पर पुलिस की लाठियाँ बरसती हैं। हम चुपचाप इस बरसात में भीगते रहे या कहे उसके ग़ुस्से की फुहारों में नहाते रहे।
जब माननीय थोड़ा रुके तो हमने शरणागत होते हुए पूछ लिया, “ माननीय अब आपको जय श्री राम की जगह क्या कहना है ..??”
अभयदान मुद्रा में “ जय जगन्नाथ..” बोलते हुए सामने से ऐसे गुज़रे जैसे कोई तूफ़ान कुछ उजाड़ने के लिए आगे निकल गया हो।
*रास बिहारी गौड़*