
बागियों के स्वर बुलंद थे, जो कल तक भाईसाहब भाईसाहब करते थे वो अंगारे उगल रहे थे । शादी पार्टी या बाजार में जब भी मिलो उनका स्वर ज़रा कडक ही था । वो परिर्वतन चाहते थे और हम संगठन व पार्टी का साथ, सहयोग और हमारी हमारे प्रत्यार्थी महोदय के प्रति कत्र्तव्य निष्ठा । मैं उनसे ज़रा भी हटने को तैयार नहीं । एक दिन सुबह वो महानुभाव मुझे मिल गये उन्होनें मेरा स्कूटर रूकवाया और बोले देख लेना इस बार हम परिर्वतन करके ही रहेंगें, हम सब व्यापारियों ने मन बना लिया है । मैं कुछ नहीं बोला । वो तिलमिला गये बोले तुमनें इस सीट पर कब्जा कर रखा हैं, इस बार हम जड से ही उखाड देगें । हद ही कर रखी है । हम सब एक जुड हैं इस बार तो तुम्हारी ऐसी कम तीन तैसी । पूरी बैंड बजा देगें ।
मेरे से भी रहा नहीं गया मैनें भी बोल दिया – बैंड तो शुभ काम में बजता है ना, तो जब पार्टी और प्रत्याशी की जीत होगी तो हम बैंड भी बजायेगें और इसी सडक (इसे आप फायसागर रोड़ अगर समझ रहे हैं तो आप सही हैं ) पर जीत का जूलूस भी निकालेगें । सत्य का साथ दिया है और आजीवन पार्टी व संगठन का ही साथ दूंगा किसी पद की लालसा में मैं अपने परिवार को नहीं छोड सकता, अब आप लोग जो कर सकते हो कर लो , तीन नहीं चार तैसी कर लेना । पर जीतगें तो भाईसाहब ही ।
वो व्यक्ति आज जब भी मुझे मिलता हैं मन करता है उससे पूछू – क्या होती है ऐसी कम तीन तैसी
आपका बलराम
2 thoughts on “ऐसी कम तीन तैसी”
Comments are closed.
अति उत्तम अति सुखद
Confidence, loyalty dedication always fetch positive results