
बचपन से एक कहानी हम सब पढ़ते सुनते आए हैं।-
देवता ने अभावों से जूझते किसी व्यक्ति को एक विशेष मुर्गी दी की जो प्रतिदिन सोने का अंडा देती थी। व्यक्ति को रोज़ सोने का अंडा मिलने लगा जिससे उसके दुख अभावों वाले दिनमान बदल गए।घर में सुख-समृद्धि आई। जैसे जैसे इच्छाओं की पूर्ति होती है मनुष्य की तृष्णाऐ बढ़ती जाती है,कभी शांत नहीं होती।उस व्यक्ति के साथ भी ऐसा ही हुआ। *सोने का अंडा रोज मिलने के बावजूद उसका लालच शांत नहीं हुआ* उसने सोचा कि मुर्गी के पेट में बहुत सारे अंडे है। उसने बहुत सारे अंडे निकालने के लिए *मुर्गी के पेट को चाकू से काट दिया।* आगे कहानी सबको मालूम है। अंडे तो मिले नहीं मुर्गी ही मर गई।जो सोने का एक अंडा प्रतिदिन मिल रहा था उससे भी वंचित होना पड़ा।
साथियों अब मुद्दे पर आते हैं। केंद्र और राज्य सरकार ने उद्योगों के विकास के लिए अरावली पर्वतमाला पर खनन के लिए जो स्वीकृति दी है उससे *लाखों वर्ष पुरानी अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व पर ख़तरा पैदा हो गया है।*
हालांकि इसके लिए *किसी एक राजनीतिक दल को दोष देना उचित नहीं।* सरकार किसी भी दल की होती भ्रष्टाचार की कमाई के लालच और विकास की अंधी दौड़ में दूसरे दलों की सरकार भी यही फैसला लेती।
*भारतीय संस्कृति में धरती को मां माना जाता है।*
सोने का अंडा देने वाली मुर्गी से धरती माता की तुलना नहीं की जा सकती।इस *धरती माता ने केवल इंसान ही नहीं बल्कि सभी जीव जंतुओं को सोने का अंडा ही नहीं बल्कि सब कुछ दिया है।इस धरती माता की रक्षा के लिए सदियों से अगणित लोगों, पुरुषों महिलाओं बच्चे अपना बलिदान देते आए हैं।यह वही राजस्थान की धरती है जहां पर (पर्यावरण)खेजड़ी के पेड़ बचाने के लिए कुल्हाड़ियों का वार अपने शरीर पर झेलकर सेंकड़ों लोगों ने अपना बलिदान दे दिया लेकिन पेड़ नहीं कटने दिया।*
आज फिर राजस्थान ही नहीं बल्कि गुजरात, मध्यप्रदेश तक आम जनता में अरावली पर्वतमाला को बचाने की चिंता पैदा हो गई है।
*विकास या विनाश*
सोशल मीडिया की जानकारी के अनुसार सरकार ने 100 मीटर ऊंची पहाडियो पर खनन की अनुमति दी है। सरकार का तर्क है कि इससे राज्य में उद्योगो का विकास होगा जनता को रोजगार मिलेगा।
भ्रष्ट नेताओं और अफसरों विकास भी होगा यह अंदर की बात है।
लेकिन इस प्रश्न का उत्तर किसी ने नहीं दिया कि पर्वतमाला के नष्ट होने के बाद राज्य के मौसम, वातावरण पर क्या असर होगा। केवल पर्वतमाला ही नहीं वनवासियों , जंगलों, अमूल्य जड़ी-बूटियों, वन्य जीवों के जीवन पर कितना असर होगा। *लाखों लोगों की आजीविका पर्वतमाला पर ही निर्भर है* उनके रोजगार के अवसर समाप्त कर पर्यावरण के घातक उद्योगों से रोजगार पैदा करना कितना उचित है? विकास या *लालच के अंधे लोग धरती माता का सीना चीर कर अनजाने में भविष्य की बर्बादी के द्वार तो नहीं खोल रहे?* छब्बे जी के चक्कर में दुब्बे जी नहीं बन जाए?
जनता का आक्रोश बढ़ कर फट न जाए इसके लिए समय रहते न्यायपालिका, कार्यपालिका को अरावली पर्वतमाला,धरती माता की रक्षा के लिए जनता के मन में उपजी आशंकाओं और संशय को दूर करने के लिए आगे आना चाहिए।
शेष अगली कड़ी में ………
*हीरालाल नाहर पत्रकार,लेखक व चिंतक*
*9929686902*