-बाबूलाल नागा
भारत में पानी को जीवन कहा जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि आजादी के 78 साल बाद भी यह जीवन हर नागरिक के लिए सुरक्षित नहीं हो पाया है। भारत में स्वच्छ पेयजल को लेकर नीति और अधिकार के बीच की खाई आज भी बनी हुई है। संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार की व्यापक व्याख्या करते हुए न्यायपालिका स्वच्छ पानी को जीवन का अनिवार्य हिस्सा मान चुकी है, लेकिन कार्यपालिका ने अब तक इसे स्पष्ट, लागू करने योग्य और जवाबदेही तय करने वाले कानूनी अधिकार का रूप नहीं दिया है। नतीजा यह है कि सुरक्षित पेयजल सरकारी योजनाओं, बजटीय प्राथमिकताओं और प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर निर्भर एक सुविधा बनकर रह गया है। स्वच्छ पेयजल आज भी भारत में एक गारंटीकृत अधिकार नहीं, बल्कि किस्मत और व्यवस्था की मेहरबानी पर टिकी सुविधा बना हुआ है। हाल ही में मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में दूषित पानी पीने से हुई मौतों ने इस कड़वी सच्चाई को एक बार फिर उजागर कर दिया है।

इंदौर की घटना केवल एक शहर या एक राज्य की विफलता नहीं है, बल्कि पूरे देश की जल-प्रबंधन व्यवस्था और सरकारी संवेदनहीनता का आईना है। दूषित पानी से लोगों की जान गई, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि भारत की जल नीति में सबसे बड़ी कमी संसाधनों की नहीं, बल्कि नियामक ढांचे, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही के अभाव की है। यह संकट केवल आपूर्ति का नहीं, बल्कि शासन मॉडल और नीति-निर्माण की गंभीर विफलता का संकेत देता है, जिस पर अब टालमटोल नहीं, ठोस और अधिकार-आधारित हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
भारत में हर दिन करोड़ों लोग यह जाने बिना पानी पीते हैं कि वह पानी उन्हें जिंदा रखेगा या धीरे-धीरे मौत की ओर ढकेलेगा। नलों से आने वाला पानी दिखने में साफ हो सकता है, लेकिन उसके भीतर घुला जहर आंखों से नहीं दिखता। यही जहर डायरिया, हैजा, टाइफाइड, पीलिया
इंदौर, जिसे देश के सबसे साफ शहरों में गिना जाता है, वहां दूषित पानी से लोगों की मौत होना अपने आप में एक बड़ा सवाल है। अगर ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘स्वच्छता मॉडल’ का दावा करने वाले शहरों में यह हाल है, तो छोटे शहरों और गांवों की स्थिति की कल्पना करना मुश्किल नहीं है। गंदे नालों का पीने के पानी की पाइपलाइनों से मिल जाना, जर्जर पाइप, जल शुद्धिकरण संयंत्रों की नियमित जांच का अभाव और समय पर क्लोरीनेशन न होना—ये सभी कारण दशकों से जाने-पहचाने हैं। इसके बावजूद हर साल किसी न किसी हिस्से में दूषित पानी लोगों की जान लेता है। फर्क सिर्फ इतना है कि हर बार प्रशासन हादसे के बाद हरकत में आता है, उससे पहले नहीं।
संविधान के अनुच्छेद 21 में जीवन के अधिकार की गारंटी दी गई है। सुप्रीम कोर्ट भी अपने कई ऐतिहासिक फैसलों में कह चुका है कि स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा हैं। इसके बावजूद आज तक स्वच्छ पेयजल को एक स्पष्ट, लागू करने योग्य और दंडात्मक मौलिक अधिकार का रूप नहीं दिया गया। सवाल यह है कि जब अदालतें यह मान चुकी हैं, तो सरकारें इसे कानून का ठोस रूप देने से क्यों बचती हैं? क्या इसलिए कि अधिकार बनने के बाद जवाबदेही तय करनी पड़ेगी?
सरकारें योजनाएं बनाती हैं—जल जीवन मिशन, अमृत योजना, स्मार्ट सिटी मिशन—लेकिन ये सभी योजनाएं राजनीतिक इच्छाशक्ति और बजट पर निर्भर हैं। योजनाएं बदली जा सकती हैं, स्थगित की जा सकती हैं या कागजों में ही सीमित रह सकती हैं। अगर स्वच्छ पानी अधिकार बन जाए, तो सरकार को हर नागरिक तक सुरक्षित पानी पहुंचाने के लिए कानूनी रूप से जवाबदेह होना पड़ेगा। शायद यही वजह है कि आज भी पानी को अधिकार नहीं, बल्कि “सरकारी सुविधा” के रूप में पेश किया जाता है।
इसका सबसे बड़ा खामियाजा गरीब, दलित, आदिवासी और हाशिए के समाज को भुगतना पड़ता है। शहरों में संपन्न वर्ग बोतलबंद पानी खरीद लेता है, आरओ लगवा लेता है, लेकिन झुग्गियों और गरीब बस्तियों में लोग वही पानी पीने को मजबूर होते हैं जो नल या हैंडपंप से आता है—चाहे वह दूषित हो या नहीं। ग्रामीण भारत में आज भी महिलाएं मीलों पैदल चलकर पानी लाने को मजबूर हैं, और वह पानी भी अक्सर सुरक्षित नहीं होता। यह स्थिति बताती है कि राज्य धीरे-धीरे अपनी जिम्मेदारी नागरिकों पर थोप चुका है।
राजनीति में पानी अक्सर केवल चुनावी वादों तक सीमित रह जाता है। सड़क, बिजली, गैस और इंटरनेट पर तो बहस होती है, लेकिन पानी जैसे बुनियादी सवाल को गंभीरता से नहीं उठाया जाता। जब तक किसी इलाके में मौतें नहीं होतीं या मीडिया का दबाव नहीं बनता, तब तक प्रशासन नींद में रहता है। इंदौर की घटना भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है—पहले मौतें, फिर जांच समिति, फिर आश्वासन, और कुछ समय बाद सब कुछ भुला दिया जाएगा।
सबसे खतरनाक बात यह है कि समाज ने भी दूषित पानी को अपनी नियति मान लिया है। “थोड़ा बहुत गंदा पानी तो चलता है” जैसी सोच ने इस संकट को और गहरा किया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई भी जहर ‘थोड़ा’ हो सकता है? क्या राज्य की लापरवाही से किसी की मौत होना सामान्य बात हो सकती है?
स्वच्छ पानी केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, यह सामाजिक न्याय और मानवाधिकार का प्रश्न है। जब दूषित पानी से कोई बच्चा मरता है, तो वह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं होती, बल्कि पूरे लोकतंत्र की हार होती है। अगर आज भी साफ पानी के लिए लोगों को संघर्ष करना पड़ रहा है, तो यह विकास के तमाम दावों पर सवालिया निशान है।
अब समय आ गया है कि स्वच्छ पेयजल को केवल नीति या योजना नहीं, बल्कि स्पष्ट मौलिक अधिकार घोषित किया जाए। ऐसा अधिकार, जिसमें यह तय हो कि दूषित पानी की आपूर्ति अपराध होगी, लापरवाही करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी और पीड़ित परिवार को न्याय मिलेगा। जब तक पानी को अधिकार नहीं बनाया जाएगा, तब तक इंदौर जैसी घटनाएं दोहराती रहेंगी—कभी किसी बड़े शहर में, कभी किसी गांव में।
पानी जीवन है—यह नारा नहीं, जिम्मेदारी होनी चाहिए। सवाल यह नहीं है कि भारत स्वच्छ पानी सभी को दे सकता है या नहीं, सवाल यह है कि क्या सत्ता और व्यवस्था अब भी मौतों के बाद जागने की राजनीति से बाहर आएगी? अगर नहीं, तो आने वाले समय में दूषित पानी भारत का सबसे बड़ा, लेकिन सबसे अनदेखा जनसंहार बन जाएगा।
सवाल अब इंदौर का नहीं, पूरे देश का है—क्या हम पानी को अधिकार मानने के लिए तैयार हैं, या फिर हर कुछ महीनों में किसी नए शहर की लाशों पर यही सवाल दोहराते रहेंगे?
(लेखक भारत अपडेट के संपादक हैं)
(संपर्कः वार्ड नंबर 1, जोबनेर, जिला-जयपुर (राजस्थान) मोबाइल-9829165513