भारतीय संस्कृति के हिन्दू सनातन धर्म में धार्मिक व पौराणिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ मास को अत्यन्त पावन मास माना गया है। इस मास में गंगा स्नान, दान अनन्त पुण्य फलदायी है। ज्योतिषविद् श्री विमल जैन जी ने बताया कि स्कन्दपुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के समान दूसरा कोई मास नहीं, गंगा के समान कोई नदी-तीर्थ नहीं है। इस बार ज्येष्ठ मास 2 मई, शनिवार से शुरू रहा है जो कि 30 जून, मंगलवार तक रहेगा। ज्येष्ठ माह के बीच अधिक मास भी लगने वाला है, जोकि 16 जून, शनिवार से 15 जुलाई, सोमवार तक रहेगा। इसे ज्येष्ठ अधिक मास कहा जाएगा। इस वर्ष ज्येष्ठ मास में पाँच बड़े मंगल (12, 19, 26 मई तथा 2 एवं 9 जून) एवं अधिक मास का भी दुर्लभ संयोग बना है। ज्योतिर्विद् श्री विमल जैन जी ने बताया कि ज्येष्ठ मास में खान, दान और व्रत की विशेष महिमा है। इस मास में भगवान श्रीहरि विष्णु के साथ श्रीहनुमानजी की भी पूजा-अर्चना करने से सुख-शांति और सभी कष्टों से मुक्ति तो मिलती ही है, साथ ही जीवन में सुख
समृद्धि, खुशहाली का मार्ग प्रशस्त होता है। ज्येष्ठ मास में पूजा का विधान ज्योतिर्विद् श्री विमल जैन जी ने बताया कि पूरे मास भर सूर्योदय के पूर्व ब्रह्ममुहूर्त में उठकर गंगा स्नान या गंगाजल मिश्रित स्वच्छ जल से स्नान कर स्वच्छ (धुले हुए) वस्त्र धारण करना चाहिए। ज्येष्ठ मास के नियम का संकल्प लेना चाहिए। भगवान श्रीहरि
विष्णुजी की विधि-विधानपूर्वक पूजन-अर्चन करके नित्य प्रतिदिन श्रीविष्णु सहस्रनाम, पाप प्रशमन स्तोत्र का पाठ तथा ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करना लाभदायी रहता है। इस सम्पूर्ण मास में एक समय शुद्ध व सात्विक भोजन करने का नियम है। ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन ज्येष्ठ मास के यम-नियम-संयम की समाप्ति हो जाती है, इस दिन उद्यापन करके ब्राह्मण को भोजन करवाकर यथाशक्ति यथासामध्यं उपयोगी सामानों का दक्षिणा सहित दान करना चाहिए। गर्मी के कारण शुद्ध जल से भरा पड़ा, सत्तू, चप्पल, छाता एवं वस्त्र आदि का दान करना विशेष फलदायी रहेगा।
अधिक ज्येष्ठ मास में तैतीस कोटि देवी-
देवताओं की प्रसत्रता के निमित्त पुरुषोत्तम भगवान के मन्दिर में तैंतीस मालपुआ अर्पित करने का विधान है। इस मास में प्रतिदिन भगवान् पुरुषोत्तम का पूजन-अर्चन, कथा-श्रवण करना, व्रत-नियम से रहना चाहिए तथा कांस्य पात्र में रखकर अन्न-वस्त्रादि एवं तैतीस मालपुआ का दान विशेष महत्वपूर्ण है। इस वर्ष अधिक मास दिनांक 16 जून, शनिवार को अर्द्धरात्रि के पश्चात् 01 बजकर 31 मिनट से आरम्भ हो रहा है तथा 15 जुलाई, सोमवार को प्रातः 8 बजकर 25 मिनट तक रहेगा। ज्योतिषविद् श्री विमल जैन जी के अनुसार अधिकमास में फल प्राप्ति की कामना से किये जाने वाले प्रायः सभी कार्य वर्जित हो जाते हैं, जैसे-कुआं, बावली तालाब एवं बाग
बगीचे आदि लगाने का आरम्भ, प्रथम व्रतारम्भव्रत उद्यापन, देव-प्रतिष्ठा, वधू-प्रवेश, भूमि, सोना एवं तुला आदि महादान विशिष्ट यज्ञ-यागादि, अष्टका श्राद्ध उपाकर्म, वेदारम्भ, वेदव्रत, गुरुदीक्षा, विवाह, उपनयन एवं चातुर्मासीय व्रतारम्भ आदि।
प्रख्यात ज्योतिर्विद् श्री विमल जैन जी ने बताया कि पुरुषोत्तम-मास में किये जाने वाले आवश्यक कर्म जैसे-प्राणघातक बीमारी आदि की निवृत्ति के लिए रुद्र मन्त्र जप, व्रतादि अनुष्ठान कपिल षष्ठी आदि व्रत, अनावृष्टि निवृत्ति हेतु पुरश्चरण-अनुष्ठानादि कार्य वषट्कार वर्जित हवन, ग्रहण-संबंधी आद्ध, दान-जपादि कार्य, पुत्रोत्पति के कर्म, गर्भाधान, पुंसवन, सीमंत-संस्कार तथा निश्चित अवधि पर समाप्त करने एवं पूर्वागत प्रयोगादि कार्य इस (अधिक) मास में किये जा सकते हैं।
अधिक मास में क्या खायें, क्या ना खायें? ज्योतिषविद् श्री विमल जैन जी ने बताया कि इस मास में गेहूं, चावल, सफेद धान, मूंग, जौ, तिल, मटर, सतुआ, शहतूत, ककड़ी, केला, घी, कटहल, आम, पीपल, जीरा, सोंठ, सुपारी, आंवला तथा सेंधा नमक का सेवन करें। मांस, शहद, उड़द की दाल, चौलाई की साग, चावल की मांड़, उड़द, लहसून, प्याज, गाजर, मूली, राई, नशीले पदार्थ, तिल का तेल एवं दूषित अन्न का त्याग करना चाहिए। इस मास में जमीन पर शयन करना चाहिए। सायंकाल पूजा-अर्चना के पश्चात् एक समय अल्पाहार या भोजन करना
चाहिए। इस मास में अपने परिवार के अतिरिक्त अन्यत्र कुछ भी खाने से बचना चाहिए।
ज्योर्तिविद् विमल जैन